कुरान - 23:117 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

117
وَمَن يَدۡعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرۡهَٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓۚ إِنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلۡكَٰفِرُونَ

Transliteration: (Wa mai yad'u ma'allaahi ilaahan aakhara laa burhaana lahoo bihee fa inna maa hisaabuhoo 'inda Rabbih; innahoo laa yuflihul kaafiroon)

और जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को पूजे [160] जिसकी उसके पास कोई दलील (सनद) नहीं [161], तो उसका हिसाब उसके रब ही के पास है [162]; बेशक काफ़िर लोग कभी फ़लाह (नजात) नहीं पाएंगे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 117 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 117

"और जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को पूजे [160] जिसकी उसके पास कोई दलील नहीं [161], तो उसका हिसाब उसके रब ही के पास है [162]; बेशक काफ़िर लोग कभी फ़लाह नहीं पाएंगे।"

[160] अल्लाह के सिवा कोई माबूद-ए-बरहक़ नहीं

अल्लाह के सिवा किसी भी मख़्लूक़ की इबादत या उसे माबूद मानना मुतलक़ बातिल और शिर्क है।

[161] शिर्क की कोई दलील या सनद नहीं

शिर्क के हक़ में न कोई अक़्ली दलील है और न ही किसी नबी या आसमानी किताब ने कभी इसकी इजाज़त दी। यह महज़ जहालत और वहम है।

[162] मुकम्मल हिसाब रब के पास और काफ़िरों की नाकामी

ऐसे मुशरिकों का मुकम्मल हिसाब अल्लाह के पास है और वे आख़िरत में हरगिज़ नजात नहीं पा सकेंगे बल्कि दायमी अज़ाब भुगतेंगे।

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