Transliteration: (Sa-yaqooloona lillaah; qul afalaa tazakkkaroon)
"वे फ़ौरन कहेंगे, 'अल्लाह ही का है!' [120] आप कहिए, 'तो फिर तुम नसीहत क्यों नहीं क़बूल करते?' [121]"
पिछली आयत के सवाल पर मुशरिकों ने बेसाख़्ता इक़रार किया कि सब कुछ अल्लाह ही का है। यह साबित करता है कि बुनियादी तौर पर वे अल्लाह के वजूद और उसकी बालादस्ती को जानते थे, लेकिन फिर भी हक़ की पैरवी से कतराते थे। उनका अपना जवाब ही उनके अक़ीदे के खोखलेपन को साबित करने के लिए काफ़ी है।
रसूलुल्लाह ﷺ को हुक्म हुआ कि उनसे पूछिए: "तो फिर तुम नसीहत क्यों नहीं क़बूल करते?" यानी जब मिल्कियत अल्लाह की है, तो बंदगी और इबादत का हक़दार भी वही है। अगर वे अपनी इस बात पर संजीदगी से ग़ौर करते, तो लाज़मी तौर पर शिर्क छोड़ देते।
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