कुरान - 23:83 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

83
لَقَدۡ وُعِدۡنَا نَحۡنُ وَءَابَآؤُنَا هَٰذَا مِن قَبۡلُ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّآ أَسَٰطِيرُ ٱلۡأَوَّلِينَ

Transliteration: (Laqad wu'idnaa nahnu wa aabaaa'unaa haazaa min qablu in haazaaa illaaa asaateerul awwaleen)

बेशक यह वादा हमसे और इससे पहले [119] हमारे बाप-दादा से भी किया जाता रहा है; यह तो बस पिछले लोगों की मनगढ़ंत कहानियां (अफ़साने) हैं!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 83 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 83

"बेशक यह वादा हमसे और इससे पहले [119] हमारे बाप-दादा से भी किया जाता रहा है; यह तो बस पिछले लोगों की मनगढ़ंत कहानियां हैं!"

[119] आसमानी वही को पुराने क़िस्से क़रार देना

यह आयत उन मुनकिरीन के तकब्बुर को ज़ाहिर करती है जो अल्लाह के वजूद को तो मानते थे मगर आख़िरत और क़ियामत के मुनकिर थे। वे कहते कि यह वादा तो पिछले ज़माने से चला आ रहा है और चूंकि अभी तक नहीं हुआ, इसलिए यह पिछले लोगों की मनगढ़ंत कहानियां (असातीरुल अव्वलीन) हैं।

यह बात सूरह जासिया (45:24) के दह्रियों (नास्तिकों) के क़ौल से मुख़्तलिफ़ है जो कहते थे 'हमें ज़माना ही मारता है'। यह फ़र्क़ कुफ़्र की अलग-अलग क़िस्मों को ज़ाहिर करता है: कुछ अल्लाह को मानकर आख़िरत के मुनकिर थे, और कुछ दोनों के मुनकिर थे। क़ुरआन ने हर तबक़े के फ़ासिद ख़यालात को वाज़ेह फ़रमाया है।

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