Transliteration: (Mat takhazal laahu minw waladinw wa maa kaana ma'ahoo min ilaah; izal lazahaba kullu ilaahim bimaa khalaqa wa la'alaa ba'duhum 'alaa ba'd; Subhaannal laahi 'ammaa yasifoon)
"अल्लाह ने न तो किसी को अपनी औलाद बनाया है [126] और न ही उसके साथ कोई दूसरा माबूद है; अगर ऐसा होता तो हर माबूद [127] अपनी बनाई हुई मख़्लूक़ को अलग ले जाता, और यक़ीनन एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ता; अल्लाह उन बातों से पाक व बुलन्द है जो ये लोग बयान करते हैं!"
यह आयत अल्लाह के लिए औलाद ठहराने के अक़ीदे को क़तई तौर पर रद्द करती है:
ईसाइयों ने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह का बेटा कहा,
और मुशरिकों ने फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियां क़रार दिया।
अल्लाह तआला इन तमाम इंसानी कमज़ोरियों और जिस्मानी तकाज़ों से पाक है। औलाद की ज़रूरत एहतिआज़ या बक़ा के लिए होती है, जबकि अल्लाह तआला अस्-समद (बेनियाज़) और दायमी है।
क़ुरआन-ए-पाक ने एक ज़बरदस्त अक़्ली दलील पेश की: अगर कायनात में एक से ज़ियादा ख़ुदा होते:
हर ख़ुदा अपनी मख़्लूक़ को अलग लेकर मुफ़ारिक़त इख़्तियार करता,
और हर एक दूसरे पर ग़ालिब आने की कोशिश करता, जिससे पूरी कायनात का निज़ाम दरहम-बरहम हो जाता।
कायनात का एक मुकम्मल, बावक़ार और मुत्तहिद निज़ाम यह साबित करता है कि उसका ख़ालिक़ व मालिक सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही अल्लाह है, जो तमाम ऐबों और मुशरिकों की बातों से पाक है।
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