कुरान - 23:94 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

94
رَبِّ فَلَا تَجۡعَلۡنِي فِي ٱلۡقَوۡمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Rabbi falaa taj'alnee fil qawmiz zaalimeen)

तो ऐ मेरे रब! मुझे उन ज़ालिम लोगों में शामिल न फ़रमाना [129]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 94 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 94

"तो ऐ मेरे रब! मुझे उन ज़ालिम लोगों में शामिल न फ़रमाना [129]!"

[129] ज़ालिमों की सोहबत और अंजाम से पनाह

यह दुआ पिछली आयत का तसल्सुल है। हुज़ूर अकरम ﷺ अल्लाह की बारगाह में इल्तिजा फ़रमाते हैं कि मुझे उन ज़ालिमों के साथ न रखना—यानी उनके अंजाम और अज़ाब से महफ़ूज़ रखना।

यह बात मुसल्लमा है कि हुज़ूर ﷺ मा'सूम हैं और जब तक आप ﷺ मुशरिकों के दरमियान मौजूद थे, अल्लाह तआला उन पर आम अज़ाब नाज़िल फ़रमाने वाला न था, जैसा कि सूरह अनफ़ाल (8:33) में फ़रमाया: 'और अल्लाह का यह काम नहीं कि उन्हें अज़ाब दे जब तक आप उनमें मौजूद हैं'।

लिहाज़ा यह दुआ अस्ल में उम्मत की रहनुमाई और तालीम के लिए है कि मोमिन को हमेशा ज़ालिमों की सोहबत, उनके आमाल और उनके बुरे अंजाम से अल्लाह की पनाह मांगते रहना चाहिए।

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