कुरान - 23:96 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

96
ٱدۡفَعۡ بِٱلَّتِي هِيَ أَحۡسَنُ ٱلسَّيِّئَةَۚ نَحۡنُ أَعۡلَمُ بِمَا يَصِفُونَ

Transliteration: (Idfa' billate hiya ahsanus saiyi'ah; nahnu a'lamu bimaa yasifoon)

आप बुराई का जवाब ऐसे तरीक़े से दीजिए जो सबसे बेहतरीन (नेकी और सब्र वाला) हो [131]; हम ख़ूब जानते हैं जो कुछ ये बातें बनाते हैं [132]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 96 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 96

"आप बुराई का जवाब ऐसे तरीक़े से दीजिए जो सबसे बेहतरीन हो [131]; हम ख़ूब जानते हैं जो कुछ ये बातें बनाते हैं [132]।"

[131] बुराई का आला इख़लाक़ी तरीक़े से दिफ़ा

रसूलुल्लाह ﷺ और आपकी पैरवी में पूरी उम्मत को यह तालीम दी गई कि बुराई का जवाब बदला लेने की नीयत से नहीं, बल्कि आला अख़लाक़ और हिक्मत भरे अंदाज़ में दिया जाए।

'जो सबसे बेहतरीन हो' के मुख़्तलिफ़ दर्जाजात हैं:

  • शिर्क का जवाब तौहीद से,

  • गुनाह का जवाब नेकी और तक़्वा से,

  • ज़ुल्म का जवाब अफ़्व व दरगुज़र से,

  • जहालत का जवाब इल्म व हिल्म से,

  • सख़्ती का जवाब नरम दावत से, और

  • वक़्त आने पर फ़साद व ज़ुल्म का जवाब शरीअत के हुदूद और जिहाद से।

जैसे जराही (ऑपरेशन) बज़ाहिर ज़ख़्म लगाना है मगर अस्ल में शिफ़ा का ज़रिया है, उसी तरह दीनी इस्लाह भी रहमत है। लिहाजा यह हुक्म दायमी है और हर दौर के लिए रहनुमा है।

[132] मुनकिरीन की बातों का अल्लाह को पूरा इल्म

अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को तसल्ली दी कि वे जो कुछ मनगढ़ंत बातें बनाते हैं—चाहे अल्लाह के लिए औलाद या शरीक ठहराना हो, या हुज़ूर ﷺ की शान में गुस्ताख़ी करना—अल्लाह को उन सब का बख़ूबी इल्म है और वह उन्हें उनके किए की पूरी सज़ा देगा।

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