Transliteration: (Yauma ya koonun naasu kal farashil mabthooth)
क़यामत के दिन पहले सूर के वक्त, लोग हर तरफ डर से घबराकर इधर-उधर भाग रहे होंगे। उनका यह भागना उसी तरह होगा जैसे किसी दीपक की रोशनी बुझने पर पतंगे इधर-उधर बिखर जाते हैं। यह आयत उस अफरा-तफरी और घबराहट की तरफ इशारा करती है, जो लोग या तो पनाह ढूंढने के लिए करेंगे या दूसरे सूर के वक्त दोबारा ज़िंदा होकर हिसाब-किताब के मैदान की तरफ भागेंगे।
इस तुलना में दिखाया गया है कि लोग किस तरह भटकते और गहरे डर में डूबे होंगे, जैसे जलते हुए दीपक के पास पतंगे बिना दिशा के उड़ते हैं। हालाँकि जिन्नात और जानवर भी दोबारा उठाए जाएंगे, लेकिन यहाँ इंसानों पर ज़ोर दिया गया है, क्योंकि वही हिसाब-किताब के असली हक़दार हैं। "इंसान" का मतलब हर शख्स से है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, नेक हो या गुनहगार।
पुनरुत्थान (resurrection) और जमा होना बहुत जल्दी होगा। जैसे ही यह प्रक्रिया पूरी होगी, एक गहरा सन्नाटा छा जाएगा। उस वक्त कोई भी घमंड या बड़प्पन नहीं दिखा पाएगा। इसी वजह से इंसानों को इस हालत में पतंगों के साथ तुलना की गई है—उनकी विनम्रता और भय को दिखाने के लिए।
मुख्य बिंदु (Key Points):
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