कुरान - 28:43 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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وَلَقَدۡ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ مِنۢ بَعۡدِ مَآ أَهۡلَكۡنَا ٱلۡقُرُونَ ٱلۡأُولَىٰ بَصَآئِرَ لِلنَّاسِ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ لَّعَلَّهُمۡ يَتَذَكَّرُونَ

Transliteration: (Wa laqad aatainaa Moosal Kitaaba mim ba'di maaa ahlaknal quroonal oolaa basaaa'ira linnaasi wa hudanw wa rahmatal la'allahum yata zakkkaroon)

और बेशक हमने पहली नस्लों को हलाक करने के बाद मूसा को किताब (तौरात) अता फ़रमाई [115], जो लोगों के लिए बसीरत (रौशनी), हिदायत और रहमत थी ताकि वे नसीहत हासिल करें [116]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 43

"और बेशक हमने पहली नस्लों को हलाक करने के बाद मूसा को किताब (तौरात) अता फ़रमाई [115], जो लोगों के लिए बसीरत (रौशनी), हिदायत और रहमत थी ताकि वे नसीहत हासिल करें [116]।"

[115] पहली सरकश क़ौमों की हलाकत के बाद तौरात का नुज़ूल

क़ौमे नूह, आद, समूद और फ़िरऔनियों जैसी पुरानी उम्मतों को हलाक फ़रमाने के बाद अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा को तौरात अता फ़रमाई। इसके बाद किसी पूरी उम्मत पर आम अज़ाब (आसमानी हलाकत) नहीं भेजा गया बल्कि जिहाद का हुक्म हुआ।

[116] आसमानी किताब की सिफ़ात

तौरात लोगों के दिलों के लिए बसीरत व बीनाई, सही रास्ते की हिदायत और मोमिनीन के लिए अल्लाह की ख़ास रहमत थी।

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