कुरान - 28:44 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ ٱلۡغَرۡبِيِّ إِذۡ قَضَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَى ٱلۡأَمۡرَ وَمَا كُنتَ مِنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ

Transliteration: (Wa maa kunta bijaanibil gharbiyyi iz qadainaaa ilaa Moosal amra wa maa kunta minash shaahideen)

और (ऐ महबूब!) आप (तूर के) पश्चिमी किनारे पर मौजूद न थे [117] जब हमने मूसा को हुक्म (शरीअत) का फ़ैसला फ़रमाया, और न आप गवाहों में से थे [118]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 44

"और (ऐ महबूब!) आप (तूर के) पश्चिमी किनारे पर मौजूद न थे [117] जब हमने मूसा को हुक्म (शरीअत) का फ़ैसला फ़रमाया, और न आप गवाहों में से थे [118];"

[117] पश्चिमी किनारे पर जिस्मानी अदम-मौजूदगी

यानी जब अल्लाह तआला ने कोहे तूर के मग़रबी जानिब हज़रत मूसा को तौरात और अहकाम अता फ़रमाए, तो ज़ाहिरी तौर पर हुज़ूर अकरम ﷺ वहाँ जिस्मानी हैसियत से मौजूद न थे।

[118] इल्म-ए-ग़ैब नबुव्वत की दलील

वहाँ ज़ाहिरी तौर पर मौजूद न होने के बावजूद इन हज़ारों साल पुराने वाक़िआत की ऐसी बारीक और हू-ब-हू तफ़्सील बयान फ़रमाना इस बात की खुली दलील है कि अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को ग़ैब के उलूम अता फ़रमाए हैं।

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