कुरान - 28:48 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

48
فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ مِنۡ عِندِنَا قَالُواْ لَوۡلَآ أُوتِيَ مِثۡلَ مَآ أُوتِيَ مُوسَىٰٓۚ أَوَلَمۡ يَكۡفُرُواْ بِمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ مِن قَبۡلُۖ قَالُواْ سِحۡرَانِ تَظَٰهَرَا وَقَالُوٓاْ إِنَّا بِكُلّٖ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Falammaa jaaa'ahumul haqqu min 'indinaa qaaloo law laa ootiya misla maaa ootiyaa Moosaa; awalam yakfuroo bimaaa ootiya Moosaa min qablu qaaloo sihraani tazaaharaa wa qaalooo innaa bikullin kaafiroon)

फिर जब उनके पास हमारी तरफ़ से हक़ (मुहम्मद ﷺ) आ गया [126], तो कहने लगे, 'इन्हें वैसा क्यों न दिया गया जैसा मूसा को दिया गया था [127]?' तो क्या उन्होंने उसका इंकार नहीं किया था जो इससे पहले मूसा को दिया गया था [128]? उन्होंने कहा [129], 'ये दोनों एक-दूसरे की मदद करने वाले जादू हैं,' और कहा, 'हम तो इन सब के मुनकिर हैं [130]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 48 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 48

"फिर जब उनके पास हमारी तरफ़ से हक़ (मुहम्मद ﷺ) आ गया [126], तो कहने लगे, 'इन्हें वैसा क्यों न दिया गया जैसा मूसा को दिया गया था [127]?' तो क्या उन्होंने उसका इंकार नहीं किया था जो इससे पहले मूसा को दिया गया था [128]? उन्होंने कहा [129], 'ये दोनों एक-दूसरे की मदद करने वाले जादू हैं,' और कहा, 'हम तो इन सब के मुनकिर हैं [130]।'"

[126] “हक़” से मुराद हुज़ूर अकरम ﷺ की ज़ात

इससे मालूम हुआ कि हुज़ूर अकरम ﷺ का एक मुबारक नाम 'हक़' भी है, क्योंकि आपका हर कौल व अमल हक़ है। यहाँ हक़ से मुराद हुज़ूर ﷺ की ज़ात-ए-मुबारका और क़ुरआन-ए-पाक हैं।

[127] मूसा अलैहिस्सलाम जैसे मोजिज़ात का मुतालबा

काफ़िर कहने लगे कि मूसा की तरह लाठी और यदे बैज़ा क्यों न दिया गया, या तौरात की तरह पूरी किताब एक ही बार में क्यों न उतारी गई!

[128] पिछले मुनकिरीन की तारीख़

अल्लाह ने फ़रमाया कि यह महज़ बहानेबाज़ी है; जब मूसा को वे मोजिज़ात दिए गए थे तब भी तो तुम्हारे जैसे मुनकिरीन ने उनका इनकार किया था!

[129] यहूदियों की साज़िश

यह एतराज कुरैश को यहूदियों ने सिखाया था कि पूछो क़ुरआन एक साथ क्यों नहीं उतरा। मगर जब यहूदियों से कहा गया कि तुम तो तौरात को मानते हो तो वे सब के सब मुकर गए।

[130] दोनों किताबों का इनकार

मुशरिकीन-ए-मक्का ने झल्लाकर कहा कि हम न क़ुरआन को मानते हैं और न तौरात को, हमारे नज़दीक दोनों ही जादू हैं।

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