कुरान - 28:50 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

50
فَإِن لَّمۡ يَسۡتَجِيبُواْ لَكَ فَٱعۡلَمۡ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهۡوَآءَهُمۡۚ وَمَنۡ أَضَلُّ مِمَّنِ ٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ بِغَيۡرِ هُدٗى مِّنَ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Fa il lam yastajeeboo laka fa'lam annamaa yattabi'oona ahwaaa'ahum; wa man adallu mimmanit taba'a hawaahu bighari hudam minal laah; innal laaha laa yahdil qawmaz zaalimeen (section 5))

फिर अगर वे आपका मुतालबा पूरा न कर सकें, तो जान लीजिए कि वे तो बस अपनी ख़्वाहिशात की पैरवी कर रहे हैं [133]; और उस शख़्स से बढ़कर गुमराह कौन होगा जो अल्लाह की हिदायत के बग़ैर अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिश की पैरवी करे [134]? बेशक अल्लाह ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 50 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 50

"फिर अगर वे आपका मुतालबा पूरा न कर सकें, तो जान लीजिए कि वे तो बस अपनी ख़्वाहिशात की पैरवी कर रहे हैं [133]; और उस शख़्स से बढ़कर गुमराह कौन होगा जो अल्लाह की हिदायत के बग़ैर अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिश की पैरवी करे [134]? बेशक अल्लाह ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता।"

[133] नफ़्सानी ख़्वाहिशात की पैरवी

जब वे कोई दलील या किताब न ला सके तो साबित हो गया कि उनका इनकार किसी अक़्ली दलील की बिना पर नहीं, बल्कि महज़ हसद, तकब्बुर और नफ़्स की ख़्वाहिश की वजह से है।

[134] नफ़्स-परस्ती सबसे बड़ी गुमराही

जो शख़्स अल्लाह की दी हुई अक़्ल और हिदायत को छोड़कर अपने नफ़्स की ख़्वाहिश का ग़ुलाम बन जाता है, वह दुनिया का सबसे बड़ा गुमराह है।

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