Transliteration: (Laa maqtoo'atinw wa laa mamnoo'ah)
"जो न कभी ख़त्म होंगे [30] और न उन पर कोई रोक-टोक होगी [31]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि जन्नत का कोई फल कभी ख़त्म नहीं होगा। जैसे ही जन्नती एक फल तोड़ेगा, फ़ौरन उसी जगह वैसा ही दूसरा लज़ीज़ फल उग आएगा। वहाँ मौसम की कोई क़ैद न होगी।
दुनिया में फल खाने पर क़ीमत, कांटे, पहरेदार या बीमारी व परहेज़ की रोक होती है, मगर जन्नत में न कोई क़ीमत है, न बीमारी और न कोई रोक-टोक। हर शख़्स जब चाहे जितना चाहे खा सकता है।
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