कुरान - 56:33 सूरह अल-वाक़िया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
لَّا مَقۡطُوعَةٖ وَلَا مَمۡنُوعَةٖ

Transliteration: (Laa maqtoo'atinw wa laa mamnoo'ah)

जो न कभी ख़त्म होंगे [30] और न उन पर कोई रोक-टोक होगी [31]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-वाक़िया आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-वाक़िआ तफ़सीर - आयत 33

"जो न कभी ख़त्म होंगे [30] और न उन पर कोई रोक-टोक होगी [31]!"


[30] दायमी और कभी न ख़त्म होने वाले फल

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि जन्नत का कोई फल कभी ख़त्म नहीं होगा। जैसे ही जन्नती एक फल तोड़ेगा, फ़ौरन उसी जगह वैसा ही दूसरा लज़ीज़ फल उग आएगा। वहाँ मौसम की कोई क़ैद न होगी।

[31] बिना किसी रोक-टोक और बीमारी के आज़ाद मुआशी

दुनिया में फल खाने पर क़ीमत, कांटे, पहरेदार या बीमारी व परहेज़ की रोक होती है, मगर जन्नत में न कोई क़ीमत है, न बीमारी और न कोई रोक-टोक। हर शख़्स जब चाहे जितना चाहे खा सकता है।

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