कुरान - 4:127 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

127
وَيَسۡتَفۡتُونَكَ فِي ٱلنِّسَآءِۖ قُلِ ٱللَّهُ يُفۡتِيكُمۡ فِيهِنَّ وَمَا يُتۡلَىٰ عَلَيۡكُمۡ فِي ٱلۡكِتَٰبِ فِي يَتَٰمَى ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِي لَا تُؤۡتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرۡغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلۡوِلۡدَٰنِ وَأَن تَقُومُواْ لِلۡيَتَٰمَىٰ بِٱلۡقِسۡطِۚ وَمَا تَفۡعَلُواْ مِنۡ خَيۡرٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِهِۦ عَلِيمٗا

Transliteration: (Wa yastaftoonaka finnisaaa'i qulil laahu yufteekum feehinna wa maa yutlaa 'alaikum fil Kitaabi fee yataaman nisaaa'il laatee laa tu'toonahunna maa kutiba lahunnna wa targhaboona an tankihoohunna wal mustad'a feena minal wildaani wa an taqoomoo lilyataamaa bilqist; wa maa taf'aloo min khairin fa innal laaha kaana bihee 'Aleemaa)

(ऐ मुहम्मद ﷺ!) लोग तुमसे औरतों के बारे में फ़ैसला चाहते हैं [378]। कह दो: अल्लाह तुम्हें उनके बारे में फ़ैसला सुनाता है [379], और वह जो किताब में तुम्हें सुनाया गया है उन यतीम लड़कियों के बारे में, जिनका हक़ तुम उन्हें नहीं देते [380], और उनसे निकाह करने से मुँह मोड़ते हो [381], और उन कमज़ोर बच्चों के बारे में भी — अल्लाह हुक्म देता है कि तुम यतीमों के साथ इंसाफ़ करो [382], और तुम जो भी भलाई करते हो, तो अल्लाह उसे खूब जानता है [383]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 127 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 127 की तफ़्सीर

 

✅ [378] यतीम लड़कियों और विधवाओं की हिफाज़त

यह आयत उन जाहिलाना रिवाज़ों की मज़म्मत में उतरी जिनमें विधवाओं और यतीम बेटियों को विरासत से महरूम कर दिया जाता था। अगर लड़की ख़ूबसूरत होती, तो थोड़ा-सा मेहर देकर शादी कर लेते; और अगर बदसूरत लेकिन मालदार होती, तो न उससे निकाह करते, न किसी और को करने देते — ताक़ि उसका माल अपने कब्जे में रहे। इस ज़ालिम रवैये को इस आयत में सख़्ती से नकारा गया है। साथ ही यह भी समझ आता है कि कभी-कभी कम उम्र की लड़की को भी क़ानूनी रूप से औरत माना जा सकता है।

✅ [379] विरासत के क़ानून अल्लाह की तरफ़ से

यहाँ फ़रमाया गया कि अल्लाह ही फ़ैसला करता है, ताकि यह बात साफ़ हो जाए कि विरासत जैसे मसलों में हुक्म अल्लाह का ही चलता है — यह कोई इंसानी राय नहीं, बल्कि सीधा अल्लाह का कानून है। इसी वजह से कुरआन में विरासत के क़ानून को बेहद तफ़्सील से बयान किया गया है।

✅ [380] इस्लाम से पहले के ज़ुल्म की याद

इस हिस्से में मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि इस्लाम से पहले वे यतीम लड़कियों के साथ कैसा ज़ुल्म करते थे। अब उन्हें उन रिवाजों को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। साथ ही, यह भी संकेत है कि ग़ैर-मुस्लिमों की विरासत उनके अपने धर्म के मुताबिक़ बांटी जाएगी, और इस्लामी क़ाज़ी उस पर फ़ैसला देंगे।

✅ [381] निकाह में भेदभाव की निंदा

यहाँ उन मर्दों की तरफ़ इशारा है जो किसी यतीम लड़की से इसलिए निकाह नहीं करते थे क्योंकि वो सुंदर नहीं या ग़रीब थी। यह सोच दुनियावी और लालची मानसिकता को दर्शाती है। इस रवैये को आयत में नापसंद किया गया है क्योंकि निकाह का मापदंड इंसाफ़ और अख़लाक़ होना चाहिए, न कि सिर्फ हुस्न और माल।

✅ [382] यतीमों के साथ इंसाफ़ और रहम

यह हुक्म कई ज़िम्मेदारियों को शामिल करता है:

  • यतीमों को उनका पूरा हक़ देना
  • उनके माल में किसी भी बहाने से हेराफेरी न करना
  • नरमी और अच्छा बर्ताव करना
  • इल्म व तरबियत का ख़्याल रखना
    मतलब, यतीमों के साथ वैसा ही सलूक करो जैसा अपने बच्चों के साथ करते हो।

✅ [383] भलाई का इनाम अल्लाह के पास

यहाँ "भलाई" से मुराद वो हर नेकी है जो यतीमों के हक़ में फ़र्ज़ से बढ़कर की जाए। इससे यह भी मालूम होता है कि सिर्फ़ फ़र्ज़ अदा करना काफी नहीं, बल्कि अल्लाह को वो नेकी भी पसंद है जो कोई इंसान दिल से और सच्चाई से करता है, भले ही दुनिया ना देखे — अल्लाह सब कुछ जानता है।

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