Transliteration: (Wa yastaftoonaka finnisaaa'i qulil laahu yufteekum feehinna wa maa yutlaa 'alaikum fil Kitaabi fee yataaman nisaaa'il laatee laa tu'toonahunna maa kutiba lahunnna wa targhaboona an tankihoohunna wal mustad'a feena minal wildaani wa an taqoomoo lilyataamaa bilqist; wa maa taf'aloo min khairin fa innal laaha kaana bihee 'Aleemaa)
यह आयत उन जाहिलाना रिवाज़ों की मज़म्मत में उतरी जिनमें विधवाओं और यतीम बेटियों को विरासत से महरूम कर दिया जाता था। अगर लड़की ख़ूबसूरत होती, तो थोड़ा-सा मेहर देकर शादी कर लेते; और अगर बदसूरत लेकिन मालदार होती, तो न उससे निकाह करते, न किसी और को करने देते — ताक़ि उसका माल अपने कब्जे में रहे। इस ज़ालिम रवैये को इस आयत में सख़्ती से नकारा गया है। साथ ही यह भी समझ आता है कि कभी-कभी कम उम्र की लड़की को भी क़ानूनी रूप से औरत माना जा सकता है।
यहाँ फ़रमाया गया कि अल्लाह ही फ़ैसला करता है, ताकि यह बात साफ़ हो जाए कि विरासत जैसे मसलों में हुक्म अल्लाह का ही चलता है — यह कोई इंसानी राय नहीं, बल्कि सीधा अल्लाह का कानून है। इसी वजह से कुरआन में विरासत के क़ानून को बेहद तफ़्सील से बयान किया गया है।
इस हिस्से में मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि इस्लाम से पहले वे यतीम लड़कियों के साथ कैसा ज़ुल्म करते थे। अब उन्हें उन रिवाजों को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। साथ ही, यह भी संकेत है कि ग़ैर-मुस्लिमों की विरासत उनके अपने धर्म के मुताबिक़ बांटी जाएगी, और इस्लामी क़ाज़ी उस पर फ़ैसला देंगे।
यहाँ उन मर्दों की तरफ़ इशारा है जो किसी यतीम लड़की से इसलिए निकाह नहीं करते थे क्योंकि वो सुंदर नहीं या ग़रीब थी। यह सोच दुनियावी और लालची मानसिकता को दर्शाती है। इस रवैये को आयत में नापसंद किया गया है क्योंकि निकाह का मापदंड इंसाफ़ और अख़लाक़ होना चाहिए, न कि सिर्फ हुस्न और माल।
यह हुक्म कई ज़िम्मेदारियों को शामिल करता है:
यहाँ "भलाई" से मुराद वो हर नेकी है जो यतीमों के हक़ में फ़र्ज़ से बढ़कर की जाए। इससे यह भी मालूम होता है कि सिर्फ़ फ़र्ज़ अदा करना काफी नहीं, बल्कि अल्लाह को वो नेकी भी पसंद है जो कोई इंसान दिल से और सच्चाई से करता है, भले ही दुनिया ना देखे — अल्लाह सब कुछ जानता है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat