Transliteration: (Yawma'iziny yawad dullazeena kafaroo wa'asawur Rasoola law tusawwaa bihimul ardu wa laa yaktumoonal laaha hadeesaa)
इस आयत में काफ़िरों की दोहरी नाकामी का ज़िक्र है: "काफ़िर हुए" मतलब अक़ीदे की ख़राबी — अल्लाह, तौहीद या रसूलुल्लाह ﷺ का इंकार। और "रसूल की नाफ़रमानी की" मतलब अमल की ख़राबी — रसूल ﷺ के हुक्मों का इंकार या उलंघन। इससे सीख मिलती है: हर मोमिन को ज़िंदगी भर अपने ईमान और अमल दोनों को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इनमें से किसी में भी कमी आख़िरत में हसरत और तबाही का सबब बन सकती है।
इस आयत में काफ़िरों की शदीद मायूसी का बयान है: क़ियामत के दिन वे चाहेंगे कि ज़मीन उनके ऊपर बराबर कर दी जाए, ताकि वे अज़ाब से बच सकें। यह उनकी नाकामी, शर्मिंदगी और बेबसी को दर्शाता है। वे अल्लाह से एक लफ़्ज़ भी नहीं छिपा सकेंगे। जैसा कि सूरा नबअ (78:40) में अल्लाह फ़रमाता है: "काफ़िर कहेगा, काश मैं मिट्टी होता!" — यानी जानवरों की तरह मिट्टी में मिल जाना चाहता है, ताकि हिसाब और सज़ा से बच सके।
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