कुरान - 4:43 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَقۡرَبُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنتُمۡ سُكَٰرَىٰ حَتَّىٰ تَعۡلَمُواْ مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِي سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغۡتَسِلُواْۚ وَإِن كُنتُم مَّرۡضَىٰٓ أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوۡ جَآءَ أَحَدٞ مِّنكُم مِّنَ ٱلۡغَآئِطِ أَوۡ لَٰمَسۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَلَمۡ تَجِدُواْ مَآءٗ فَتَيَمَّمُواْ صَعِيدٗا طَيِّبٗا فَٱمۡسَحُواْ بِوُجُوهِكُمۡ وَأَيۡدِيكُمۡۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa taqrabus Salaata wa antum sukaaraa hatta ta'lamoo ma taqooloona wa laa junuban illaa 'aabiree sabeelin hatta taghtasiloo; wa in kuntum mardaaa aw 'alaa safarin aw jaaa'a ahadum minkum minal ghaaa'iti aw laamastumun nisaaa'a falam tajidoo maaa'an fatayam mamoo sa'eedan taiyiban famsahoo biwujoohikum wa aideekum; innal laaha kaana 'Afuwwan Ghafooraa)

ऐ ईमान वालों! जब तुम नशे की हालत में हो तो नमाज़ के क़रीब न जाओ [157], जब तक कि ये न समझ लो कि तुम क्या कह रहे हो [158]; और न ही (बग़ैर ग़ुस्ल के) जनाबत की हालत में नमाज़ के क़रीब जाओ — जब तक कि तुम ग़ुस्ल न कर लो, सिवाय राह चलते हुए। और अगर तुम बीमार हो [159], या सफ़र में हो [160], या तुम में से कोई हाज़तख़ाना करके आए, या औरतों को छु लिया हो [161], फिर अगर पानी न मिले, तो पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो [162], और अपने चेहरे और हाथों पर मसह कर लो [163]; बेशक अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, बख़्शने वाला है [164]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 43 की तफ़्सीर

 

✅ [157] नशे की हालत में नमाज़ से रोकने का कारण

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रज़ि.) के घर सहाबा इकट्ठा हुए। खाना खाने के बाद शराब पी गई, फिर नमाज़ हुई। इमाम ने सूरा अल-काफ़िरून की तिलावत की, मगर हर जगह से "ला" हटा दिया — जिससे मतलब उल्टा हो गया। इस पर यह आयत नाज़िल हुई: पहले शराब को नमाज़ के वक़्त हराम किया गया, फिर मुकम्मल रूप से मना कर दिया गया। सबक: नशे, बेहोशी या गहरी नींद में जहाँ समझ न हो, वहां नमाज़ जायज़ नहीं। और अगर कोई बेख़बरी में कुफ़्र की बात कह दे, तो वह काफ़िर नहीं होता, क्योंकि नीयत व होश की शर्त है।

✅ [158] जनाबत की हालत में ग़ुस्ल ज़रूरी

आयत में चेतावनी दी गई कि जो व्यक्ति जनाबत (यानी ग़ुस्ल लाज़िम) की हालत में हो, वह नमाज़ के क़रीब न जाए — चाहे वह हैबतल अज़ीम (हमबिस्तरी) हो या मनी निकलना। हाँ, अगर वह सफ़र में है या पानी नहीं मिलता, तो तयम्मुम कर सकता है।

✅ [159] बीमारी की हालत में रियायत

अगर कोई बीमार हो और पानी का इस्तेमाल जान को नुक़सान पहुँचा सकता हो, तो तयम्मुम जायज़ है — चाहे वह खुद के तजुर्बे से हो या माहिर हकीम की सलाह से।

✅ [160] सफ़र में तयम्मुम की छूट

"सफ़र" का मतलब यहाँ वह हालात हैं जब शहर से बाहर हों, और आमतौर पर पानी ना मिलता हो। इसका मतलब शरीअत वाला सफ़र ज़रूरी नहीं।

✅ [161] "औरतों को छुना" का मतलब क्या है?

हанаफ़ी फ़िक़्ह के अनुसार, सिर्फ़ छूना वुज़ू नहीं तोड़ता। जैसे "हाज़तख़ाना से आना" का मतलब पेशाब-पखाना करना है, वैसे ही "औरतों को छुना" का मतलब है हमबिस्तरी या नंगी हालत में छेड़छाड़। अगर बग़ैर कपड़ों के जिस्मानी रिश्ता हो, तो ग़ुस्ल वाजिब, और अगर नंगी हालत में छूना हो, तो वुज़ू लाज़िम।

✅ [162] तयम्मुम के लिए पाक मिट्टी क्या है?

तयम्मुम के लिए जो चीज़ें जायज़ हैं: कोयला, पत्थर का नमक, साफ़ मिट्टी वग़ैरह — ऐसी चीजें जो: आग में जलकर राख न बनें, और पिघलें नहीं। पानी आधारित या कृत्रिम नमक तयम्मुम के लिए सही नहीं।

✅ [163] हज़रत आइशा (रज़ि.) का हार और तयम्मुम का हुक्म

बनी मुस्तलिक की जंग से लौटते वक़्त, हज़रत आइशा (रज़ि.) का हार खो गया। पूरा क़ाफ़िला, जिनमें रसूलुल्लाह ﷺ भी थे, रुक गया। पानी मौजूद नहीं था, और नमाज़ का वक़्त हो गया। इस पर तयम्मुम की यह आयत नाज़िल हुई। हज़रत उसैद बिन हुज़ैर (रज़ि.) ने कहा: "अबू बक्र के घराने वालों! ये तुम्हारी पहली बरकत नहीं है मुसलमानों के लिए।" — इससे हज़रत आइशा (रज़ि.) की फ़ज़ीलत व बरकत ज़ाहिर होती है।

✅ [164] तयम्मुम वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों के लिए

इससे पता चलता है कि तयम्मुम का एक ही तरीक़ा वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों के लिए बराबर है — क्योंकि आयत में दोनों हालात का ज़िक्र है, और तरीक़ा एक ही रखा गया। यह इस्लामी शरीअत की रहमत और आसानियाँ दर्शाता है।

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