Transliteration: (Wallaahu a'lamu bi a'daaa'i-kum; wa kafaa billaahi waliyyanw wa kafaa billaahi naseera)
इससे हमें यह सबक मिलता है: जिसे अल्लाह दुश्मन कहे, उसे हमें भी दुश्मन समझना चाहिए — चाहे वह दोस्त, बच्चा या जीवनसाथी ही क्यों न हो। अल्लाह फ़रमाता है: "तुम्हारी बीवियाँ और तुम्हारे बच्चे तुम्हारे दुश्मन हैं, तो उनसे सावधान रहो" (सूरा अत-तग़ाबुन, 64:14)। यानी अगर कोई बे-दीनी की राह पर है, तो वह करीबी होते हुए भी सच्चा साथी नहीं हो सकता। जबकि एक सच्चा मोमिन, चाहे अजनबी ही क्यों न हो, वह एक मोमिन का हक़ीकी दोस्त होता है। ईमान ही असली रिश्ता है, न कि खून का या दुनिया का नाता।
इस आयत का दूसरा हिस्सा मोमिनों को तसल्ली देता है: अल्लाह की हिफाज़त ही काफ़ी है, दुश्मनों की चालों और साज़िशों से बचाने के लिए। उसकी सरपरस्ती दुनियावी और रूहानी दोनों सुरक्षा देती है। ख़ासकर: रसूलुल्लाह ﷺ के सहाबा अल्लाह के फ़ज़ल से गुमराही से महफ़ूज़ रहे। यहाँ तक कहा गया कि जिन पर सहाबा की रहमत भरी नज़र पड़ जाए, वे भी गुमराही से बच जाते हैं। इसलिए अल्लाह सिर्फ़ वकील (संरक्षक) ही नहीं, बल्कि नसीर (सर्वश्रेष्ठ मददगार) भी है मोमिनों के लिए।
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