Transliteration: (Walqawaa’idu minan nisaaa’il laatee laa yarjoona nikaahan fa laisa ‘alaihinna junaahun ai yada’na siyaabahunna ghaira mutabarrijaatin bi zeenah; wa ai yasta’fif na khairul lahunn; wallaahu Samee’un ‘Aleem)
"और बड़ी उम्र की औरतें जिन्हें निकाह की उम्मीद नहीं [161], उन पर गुनाह नहीं कि ज़ीनत की नुमाइश किए बिना ऊपर के कपड़े उतार रखें [162]; और अगर बचें तो बेहतर है [163]; और अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।"
वे बूढ़ी औरतें जो हैज़ से मायूस हो चुकी हों और बुढ़ापे की वजह से उनमें निकाह की कोई रग़बत या जिंसी कशिश बाक़ी न रही हो, उनके लिए शरीअत ने यह आसानी दी कि वे घर में ऊपर की बड़ी चादर (बुरक़ा) उतार सकती हैं, बशर्ते कि बनाव-सिंगार की नुमाइश मक़सूद न हो।
अलबत्ता अगर वे बुढ़ापे में भी पूरी चादर ओढ़े रहें तो यह तक़्वा और पाकीज़गी के एतबार से उनके लिए ज़्यादा अफ़ज़ल और बा-अज्र है।
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