कुरान - 24:60 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

60
وَٱلۡقَوَٰعِدُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِي لَا يَرۡجُونَ نِكَاحٗا فَلَيۡسَ عَلَيۡهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعۡنَ ثِيَابَهُنَّ غَيۡرَ مُتَبَرِّجَٰتِۭ بِزِينَةٖۖ وَأَن يَسۡتَعۡفِفۡنَ خَيۡرٞ لَّهُنَّۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٞ

Transliteration: (Walqawaa’idu minan nisaaa’il laatee laa yarjoona nikaahan fa laisa ‘alaihinna junaahun ai yada’na siyaabahunna ghaira mutabarrijaatin bi zeenah; wa ai yasta’fif na khairul lahunn; wallaahu Samee’un ‘Aleem)

और बड़ी उम्र की बैठी रहने वाली औरतें जिन्हें निकाह की कोई उम्मीद नहीं रही [161], उन पर इसमें कोई गुनाह नहीं कि वे अपनी ज़ीनत की नुमाइश किए बिना अपने ऊपर के कपड़े (चादर) उतार रखें [162]; और अगर वे इससे भी बचें (और चादर ओढ़े रहें) तो यह उनके लिए ज़्यादा बेहतर है [163]; और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 60 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 60

"और बड़ी उम्र की औरतें जिन्हें निकाह की उम्मीद नहीं [161], उन पर गुनाह नहीं कि ज़ीनत की नुमाइश किए बिना ऊपर के कपड़े उतार रखें [162]; और अगर बचें तो बेहतर है [163]; और अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।"

[161-162] ज़ईफ़ा औरतों के लिए पर्दे में रुख़सत

वे बूढ़ी औरतें जो हैज़ से मायूस हो चुकी हों और बुढ़ापे की वजह से उनमें निकाह की कोई रग़बत या जिंसी कशिश बाक़ी न रही हो, उनके लिए शरीअत ने यह आसानी दी कि वे घर में ऊपर की बड़ी चादर (बुरक़ा) उतार सकती हैं, बशर्ते कि बनाव-सिंगार की नुमाइश मक़सूद न हो।

[163] एहतियात और अफ़ज़ल तरीक़ा

अलबत्ता अगर वे बुढ़ापे में भी पूरी चादर ओढ़े रहें तो यह तक़्वा और पाकीज़गी के एतबार से उनके लिए ज़्यादा अफ़ज़ल और बा-अज्र है।

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