कुरान - 24:1 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
سُورَةٌ أَنزَلۡنَٰهَا وَفَرَضۡنَٰهَا وَأَنزَلۡنَا فِيهَآ ءَايَٰتِۭ بَيِّنَٰتٖ لَّعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ

Transliteration: (Sooratun anzalnaahaa wa faradnaahaa wa anzalnaa feehaaa Aayaatim baiyinaatil la'allakum tazakkaroon)

यह एक सूरह है [2] जिसे हमने नाज़िल फ़रमाया है और हमने फ़र्ज़ किया है [3] इसके अहकाम को, और हमने इसमें रौशन आयतें उतारी हैं ताकि तुम नसीहत हासिल करो [4]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 1

"यह एक सूरह है [2] जिसे हमने नाज़िल फ़रमाया है और हमने फ़र्ज़ किया है [3] इसके अहकाम को, और हमने इसमें रौशन आयतें उतारी हैं ताकि तुम नसीहत हासिल करो [4]।"

[2] सूरह क्या है?

क़ुरआन-ए-मजीद की आयात के उस ख़ास मजमुए को सूरह कहा जाता है जिसका एक मख़्सूस उनवान और तर्तीब इलाही वही के ज़रिए मुक़र्रर की गई है। हिजरत से पहले नाज़िल होने वाली सूरतें मक्की और हिजरत के बाद नाज़िल होने वाली सूरतें मदनी कहलाती हैं। सूरह अन-नूर मदनी सूरत है।

[3] अहकाम की फ़र्ज़ियत

इस सूरह के अहकाम ख़ास तौर पर अहले-ईमान पर फ़र्ज़ किए गए हैं, क्योंकि इसके अक्सर अहकाम का ताल्लुक़ मुआशरती ज़िन्दगी, पाकदामनी, इज्ज़त व आबरू की हिफ़ाज़त और क़ानून-ए-शरीअत के निफ़ाज़ से है।

[4] वाज़ेह क़ानूनी अहकाम

'रौशन आयतें' उन वाज़ेह, मुस्तहकम और दो-टोक अहकाम को कहा गया है जो इंसानी मुआशरे की पाकीज़गी का ज़ामिन हैं। इनमें ज़िना की सज़ा, बोहतान तराशी (क़ज़फ़) की हद्द, और घरेलू आज़ादी व पर्दे के क़वानीन बुनियादी अहमियत रखते हैं ताकि लोग नसीहत हासिल करके पाकीज़ा ज़िन्दगी गुज़ारें।

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