कुरान - 24:2 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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ٱلزَّانِيَةُ وَٱلزَّانِي فَٱجۡلِدُواْ كُلَّ وَٰحِدٖ مِّنۡهُمَا مِاْئَةَ جَلۡدَةٖۖ وَلَا تَأۡخُذۡكُم بِهِمَا رَأۡفَةٞ فِي دِينِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۖ وَلۡيَشۡهَدۡ عَذَابَهُمَا طَآئِفَةٞ مِّنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Azzaaniyatu wazzaanee fajlidoo kulla waahidim minhumaa mi'ata jaldatinw wa laa taakhuzkum bihimaa raafatun fee deenil laahi in kuntum tu'minoona billaahi wal Yawmil Aakhiri wal yashhad 'azaabahumaa taaa'ifatum minal mu'mineen)

ज़िना करने वाली औरत और ज़िना करने वाले मर्द में से हर एक को [5] सौ कोड़े मारो [6]; और अल्लाह के दीन (क़ानून लागू करने) में तुम्हें उन पर कोई तरस न आए अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो [7]; और चाहिए कि उनकी सज़ा के वक़्त मोमिनों का एक गिरोह हाज़िर रहे [8]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 2

"ज़िना करने वाली औरत और ज़िना करने वाले मर्द में से हर एक को [5] सौ कोड़े मारो [6]; और अल्लाह के दीन में तुम्हें उन पर कोई तरस न आए अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो [7]; और चाहिए कि उनकी सज़ा के वक़्त मोमिनों का एक गिरोह हाज़िर रहे [8]।"

[5] इस्लामी शरीअत में मुक़र्ररा सज़ा (हद्द)

यह आयत मुबारका हनफ़ी फ़िक़्ह की रौशनी में यह साबित करती है कि ग़ैर-शादीशुदा (ग़ैर-मुहसन) ज़ानी की मुक़र्ररा शरई हद्द सौ कोड़े है। हदीस में जो एक साल की जिलावतनी (देस निकाला) का ज़िक्र है, वह क़ाज़ी की सियासी व तअज़ीरी तसवीब पर मुनहसिर है, शरई हद्द का हिस्सा नहीं।

[6] हुक्काम से ख़िताब और मुहसन की शर्त

यह हुक्म इस्लामी हुकूमत और हुक्काम से है, क्योंकि हुदूद का निफ़ाज़ अवाम के हाथ में नहीं बल्कि क़ानूनी इख़्तियारात के ताबे है। यहाँ मुराद ग़ैर-शादीशुदा अफ़राद हैं, क्योंकि शादीशुदा (मुहसन) ज़ानी की सज़ा संगसार (रज्म) है जो सुन्नत-ए-मुतवातिरा से साबित है। मुहसन वह आज़ाद, आक़िल, बालिग़ मुसलमान है जिसने सहीह निकाह के बाद सोहबत की हो।

[7] इलाही क़ानून के निफ़ाज़ में बेजा नरमी की मुमानअत

अल्लाह के मुक़र्रर कर्दा क़वानीन को नाफ़िज़ करते वक़्त किसी क़िस्म की बेजा रहमदिली, रियायत या तरस खाना जायज़ नहीं। अगर तुम अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखते हो तो हुदूदुल्लाह के निफ़ाज़ में ज़ात या मन्सब का लिहाज़ न करो। बेजा रियायत मुआशरे में जुर्म को बढ़ाती है और अमन व अमान को बर्बाद कर देती है।

[8] इब्रत के लिए अवाम की मौजूदगी

सज़ा के वक़्त मुसलमानों की एक जमाअत का मौजूद होना लाज़िम किया गया ताकि यह सज़ा सिर्फ़ सज़ा न रहे बल्कि मुआशरे के लिए एक इब्रतनाक दर्स बने, जिससे दूसरों को ऐसे घिनौने जुर्म के क़रीब जाने की जुर्रत न हो।

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