मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रहमान आयत 60 तफ़सीर
मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)
सूरह अर-रहमान तफ़सीर - आयत 60
"नेकी का बदला नेकी के सिवा और क्या हो सकता है [54]?"
[54] एहसान का बदला एहसान—कलिमा-ए-तय्यिबा और जन्नत
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
पहला एहसान: पहले एहसान से मुराद दुनिया में कलिमा-ए-तय्यिबा पर ईमान लाना और नेक आमाल बजा लाना है।
दूसरा एहसान: दूसरे एहसान से मुराद आख़िरत में जन्नत की दायमी नेमतें, रहमत और दीदार-ए-इलाही है।
हुस्न-ए-सुलूक की तालीम: यह आयत यह भी सिखाती है कि अगर कोई तुम्हारे साथ भलाई करे तो तुम भी उसके साथ भलाई और एहसान का बर्ताव करो, ख़ास तौर पर वालिदैन और क़रीबी रिश्तेदारों के साथ।
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