कुरान - 37:158 सूरह अस-साफ़्फ़ात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

158
وَجَعَلُواْ بَيۡنَهُۥ وَبَيۡنَ ٱلۡجِنَّةِ نَسَبٗاۚ وَلَقَدۡ عَلِمَتِ ٱلۡجِنَّةُ إِنَّهُمۡ لَمُحۡضَرُونَ

Transliteration: (Wa ja'aloo bainahoo wa bainal jinnati nasabaa; wa laqad 'alimatil jinnatu innahum lamuhdaroon)

और उन्होंने अल्लाह के और जिन्नों के दरमियान रिश्ता ठहराया [159], और बेशक जिन्नों को मालूम है कि वे ज़रूर पेश किए जाएंगे [160] (हाज़िर किए जाएंगे)। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-साफ़्फ़ात आयत 158 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-साफ़्फ़ात तफ़सीर - आयत 158

"और उन्होंने अल्लाह के और जिन्नों के दरमियान रिश्ता ठहराया [159], और बेशक जिन्नों को मालूम है कि वे ज़रूर पेश किए जाएंगे [160] (हाज़िर किए जाएंगे)।"

[159] जिन्नात से रिश्तेदारी का बातिल दावा

बाज़ मुशरिकीन बद-अक़ीदगी में यहाँ तक बढ़ गए कि उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने जिन्नात में शादी की और उससे फ़रिश्ते पैदा हुए (नौजुबिल्लाह, जैसा कि तफ़सीर अल-इरफ़ान में ज़िक्र है)।

क़ुरआन मजीद ने इस बातिल दावे की तरदीद फ़रमाई कि ख़ूनी रिश्ता या नसब एक ही जिन्स और नौअ के दरमियान होता है; अल्लाह तआला ख़ालिक़ है और जिन्नात मख़्लूक़, ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान कोई नसब या रिश्तेदारी मुम्किन ही नहीं।

अल्लाह और बंदों के दरमियान तअल्लुक़ इताअत, बंदगी और मुहब्बत का है, न कि नसब व ख़ानदान का:

  • इन्सान और जिन्नात अल्लाह के आजिज़ बंदे हैं।

  • हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ अल्लाह के हबीब और महबूब हैं।

  • तमाम कायनात उसकी बंदगी में झुकी हुई है।

[160] जिन्नात की जवाबदेही और हाज़िरी

जिन्नात ख़ुद जानते हैं कि वे अल्लाह की बारगाह में मुहासिबे और हिसाब-किताब के लिए ज़रूर पेश किए जाएंगे।

अगर उनका अल्लाह से कोई (नौजुबिल्लाह) रिश्तेदारी का तअल्लुक़ होता, तो वे अज़ाब से महफ़ूज़ रहते। मगर जब वे ख़ुद अपने मुहासिबे और अज़ाब से काँपते हैं, तो मुशरिकीन का यह दावा बिल्कुल झूठा और बे-अस्ल साबित हो गया।

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