Transliteration: (Ulaaa'ika lahum rizqum ma'loom)
"यही वे लोग हैं जिनके लिए एक जाना-पहचाना रिज़्क़ है [42],"
जन्नत का रिज़्क़ ऐसा अज़ीम और लज़ीज़ है जिसे न किसी आंख ने देखा, न कान ने सुना और न किसी इंसान के दिल पर उसका ख़याल गुज़रा। अल्लाह तआला ने शबे मेअराज अपने हबीब हुज़ूर अकरम ﷺ को जन्नत की इन तमाम नेमतों और रिज़्क़ का मुशाहदा फ़रमा दिया था।
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