कुरान - 26:102 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

102
فَلَوۡ أَنَّ لَنَا كَرَّةٗ فَنَكُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Falaw anna lanaa karratan fanakoona minal mu'mineen)

तो काश कि हमारे लिए (दुनिया में) एक बार फिर लौटना मुमकिन होता [106], ताकि हम सच्चे मोमिन बन जाते [107]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 102 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 102

"तो काश कि हमारे लिए एक बार फिर लौटना मुमकिन होता [106], ताकि हम सच्चे मोमिन बन जाते [107]!'"

[106] दुनिया में दोबारा लौटने की बेसूद तमन्ना

जब दोज़ख़ी देखेंगे कि न कोई मददगार है और न सिफ़ारिशी, तो वे इंतहाई मायूसी और हसरत से तमन्ना करेंगे कि काश हमें सिर्फ़ एक बार दुनिया में वापस भेज दिया जाए ताकि हम अपनी पिछली ग़लतियों की तलाफ़ी कर सकें। लेकिन यह तमन्ना महज़ ख़्वाबो-ख़याल है, दुनिया इम्तिहान की जगह थी जो ख़त्म हो चुकी।

[107] देर से हुआ एतराफ़-ए-हक़ीक़त

वे कहेंगे कि अगर हमें दोबारा मोहलत मिले तो हम ज़रूर अल्लाह और उसके रसूलों पर सच्चा ईमान लाकर फ़रमांबरदार बन जाएंगे। मगर वक़्त गुज़र जाने के बाद का ईमान कोई फ़ायदा नहीं देता। नजात का दारोमदार गै़ब पर ईमान लाने में था, अज़ाब देखकर तो फ़िरऔन ने भी ईमान का दावा किया था मगर वह मुस्तरद कर दिया गया।

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