Transliteration: (Faqara ahoo 'alaihim maa kaanoo bihee mu'mineen)
"फिर वह इसे उनके सामने पढ़कर सुनाता, तब भी वे ईमान लाने वाले न थे [198]!"
हुज़ूर ﷺ 'उम्मी' हैं यानी आपने किसी इंसान से पढ़ना-लिखना नहीं सीखा, इसके बावजूद आपने ऐसा बेमिसाल फ़सीह कलाम पेश फ़रमाया जिसका जवाब अरब के बड़े-बड़े शोअरा न दे सके। अगर किसी ठेठ अजमी की ज़बान से भी यह अरबी कलाम जारी होता, तब भी ये मुशरिक ईमान न लाते बल्कि उसे जादू कह कर टाल देते। यह साबित करता है कि उनका इंकार दलील की कमी की वजह से नहीं बल्कि महज़ ज़िद और अना की बिना पर था।
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