कुरान - 26:201 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

201
لَا يُؤۡمِنُونَ بِهِۦ حَتَّىٰ يَرَوُاْ ٱلۡعَذَابَ ٱلۡأَلِيمَ

Transliteration: (Laa yu'minoona bihee hattaa yarawul 'azaabal aleem)

वे इस पर ईमान नहीं लाएंगे यहाँ तक कि वे दर्दनाक अज़ाब को (अपनी आंखों से) देख लें [200]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 201 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 201

"वे इस पर ईमान नहीं लाएंगे जब तक कि दर्दनाक अज़ाब न देख लें [200];"

[200] अज़ाब देखकर लाया हुआ ईमान ग़ैर-मक़बूल

मुशरिकों का यह हाल है कि वे ज़िन्दगी भर हक़ का मज़ाक़ उड़ाएंगे और सिर्फ़ उस वक़्त कलमा पढ़ने की कोशिश करेंगे जब अज़ाब-ए-इलाही उनके सरों पर आ धमकेगा। मगर मौत और अज़ाब को सामने देखकर लाया गया ईमान अल्लाह की बारगाह में क़बूल नहीं होता, क्योंकि ईमान 'बिल-ग़ैब' ही मोतबर है।

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