कुरान - 11:70 सूरह हूद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

70
فَلَمَّا رَءَآ أَيۡدِيَهُمۡ لَا تَصِلُ إِلَيۡهِ نَكِرَهُمۡ وَأَوۡجَسَ مِنۡهُمۡ خِيفَةٗۚ قَالُواْ لَا تَخَفۡ إِنَّآ أُرۡسِلۡنَآ إِلَىٰ قَوۡمِ لُوطٖ

Transliteration: (Falammaa ra aaa aidiyahum laa tasilu ilaihi nakirahum wa awjasa minhum kheefah; qaaloo laa takhaf innaaa ursilnaaa ilaa qawmi Loot)

फिर जब देखा कि उनके हाथ खाने की तरफ़ नहीं बढ़ते, तो उन्हें अजनबी समझा और दिल में उनसे ख़ौफ़ महसूस किया [145]। उन्होंने कहा, 'डरिए नहीं, हम तो लूत की क़ौम की तरफ़ भेजे गए हैं।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह हूद आयत 70 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा हूद – आयत 70 की तफ़्सीर

✅ [145] अजनबियत का ख़ौफ़ और फ़रिश्तों की पहचान

उस ज़माने में यह दस्तूर था कि अगर कोई मेहमान खाना न खाए तो समझा जाता था कि वह किसी बदनीयती या दुश्मनी से आया है। फ़रिश्ते चूंकि खाने-पीने से पाक होते हैं, इसलिए उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया। जब इब्राहीम (अलै.) को अंदेशा हुआ तो फ़रिश्तों ने अर्ज़ किया कि हम अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्ते हैं और क़ौमे लूत की हलाकत के लिए आए हैं।

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