Transliteration: (Alif-Laaam-Raa; Kitaabun uhkimat Aayaatuhoo summa fussilat mil ladun Hakeemin Khabeer)
सूरह हूद मक्की है, सिवाय कुछ हिस्सों के जैसे आयत बारह, आयत सत्रह का एक हिस्सा ("जो लोग इस पर ईमान लाते हैं"), और आयत एक सौ चौदह। इसमें दस रुकू और एक सौ तेईस आयतें हैं। यह क़ुरआन के मुक़द्दस और मुकम्मल होने को ज़ाहिर करता है, क्योंकि यह किताब इलाही तौर पर मुक़र्रर की गई है जिसमें इंसानियत के लिए हिदायत का कामिल निज़ाम है।
आयत में ज़िक्र है कि क़ुरआन की आयतें मुस्तहकम और मुकम्मल की गई हैं, यानी अपने नुज़ूल के वक़्त वे कामिल, वाज़ेह और किसी भी शक व शुबहे से पाक थीं। यह कमाल सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की बनावट या ज़ोर से नहीं बल्कि उनकी हिकमत से पैदा होता है। यहां तक कि जो आयतें मंसूख़ हुईं, उनमें भी अपनी मुद्दत के लिहाज़ से हिकमत मौजूद थी जो तब्दीली के पीछे इलाही हिकमत को ज़ाहिर करती है, जबकि जो बाक़ी हैं वे हमेशा रहने वाली हिकमत की हामिल हैं।
आयत में "फिर" का इस्तेमाल मर्तबे की तरतीब और ज़माने की तरक़्क़ी दोनों को ज़ाहिर करता है। क़ुरआनी आयतें न सिर्फ़ दुरुस्ती के साथ पेश की गई हैं बल्कि उनकी तफ़सील से वज़ाहत भी की गई है। इन मुफ़स्सल बयानात में अकायद, आमाल और वाक़िआत शामिल हैं जो इलाही पैग़ाम को वाज़ेह करते हैं, ताकि समझ चाहने वालों के लिए कोई पहलू पोशीदा न रहे।
आयत का ख़ात्मा क़ुरआन नाज़िल करने वाली ज़ात की याददिहानी के साथ होता है: "उस ज़ात की तरफ़ से जो हिकमत वाली और बाख़बर है।" यह इस बात पर ज़ोर देता है कि क़ुरआन की आयतों की हक़ीक़ी अज़मत और गहराई इसके नाज़िल फ़रमाने वाले की इलाही सिफ़ात से तय होती है। अल्लाह का मुकम्मल इल्म और हिकमत क़ुरआन को बेमिसाल रहनुमाई अता करते हैं, जो मोमिनों को ग़ैब और अबदी सच्चाइयों की गहरी समझ की तरफ़ ले जाते हैं।
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