Transliteration: (Wa maa min daaabbatin fil ardi illaa 'alal laahi rizquhaa wa ya'lamu mustaqarrahaa wa mustawda'ahaa; kullun fee Kitaabim Mubeen)
आयत में ज़मीन के जानदारों का ख़ास ज़िक्र इसलिए है क्योंकि वे हमारी नज़रों के सामने हैं। अलबत्ता तमाम मख़लूक़ात—हवा के परिंदे हों या समंदर की मछलियां—सबका रिज़्क़ अल्लाह ही के ज़िम्मे है।
इससे हम सीखते हैं कि इंसान के लिए यह बेवक़ूफ़ी है कि वह रिज़्क़ की तलाश में इतना डूब जाए कि अपने रब और आख़िरत को भूल जाए, जबकि रिज़्क़ का ज़िम्मा तो अल्लाह ने ले रखा है।
अल्लाह तआला जानता है कि हर मख़लूक़ कहां रहेगी, कहां दफ़्न होगी, और मौत के बाद उसका क्या ठिकाना होगा। कोई ज़र्रा भी उसके इल्म से बाहर नहीं।
यह याद रखना ज़रूरी है कि लौहे महफ़ूज़ पर सब कुछ लिखना इसलिए नहीं है कि अल्लाह को याद रखने के लिए इसकी ज़रूरत थी, बल्कि यह फ़रिश्तों और मख़लूक़ पर हुज्जत और अल्लाह के कमाल इल्म का इज़हार है।
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