Transliteration: (Alaa innahum yasnoona sudoorahum liyastakhfoo minh; alaa heena yastaghshoona siyaabahum ya'lamu maa yusirroona wa maa yu'linoon; innahoo 'aleemun bizaatis sudoor (End Juz 11))
यह आयत उन लोगों के बारे में नाज़िल हुई जो क़ुदरती हाजत या बीवी से क़ुर्बत के वक़्त आसमान की तरफ़ पीठ करने या पर्दा करने में हद से ज़्यादा झिझकते थे, या मुनाफ़िक़ों के बारे में जो अपने बुग्ज़ को छुपाने के लिए कपड़े लपेट लेते थे।
यह आयत सिखाती है कि इंसान को अल्लाह से कोई चीज़ छुपाने की ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए क्योंकि अल्लाह हर पोशीदा बात जानता है। हज़रत आयशा (रज़ि.) फ़रमाती हैं कि जब हुज़ूर ﷺ और हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) की क़ब्रें मेरे हुजरे में थीं तो मैं बेतकल्लुफ़ जाती थी, लेकिन जब हज़रत उमर (रज़ि.) दफ़्न हुए तो मैंने हया की वजह से हमेशा चादर ओढ़ कर ही दाख़िला लिया। इससे यह भी मालूम होता है कि अहले क़ुबूर ज़ियारत करने वालों को पहचानते हैं।
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