कुरान - 31:11 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
هَٰذَا خَلۡقُ ٱللَّهِ فَأَرُونِي مَاذَا خَلَقَ ٱلَّذِينَ مِن دُونِهِۦۚ بَلِ ٱلظَّـٰلِمُونَ فِي ضَلَٰلٖ مُّبِينٖ

Transliteration: (Haazaa khalqul laahi fa aroonee maazaa khalaqal lazeena min doonih; baliz zaalimoona fee dalalim Mubeen (section 1))

यह अल्लाह की मख़्लूक़ (पैदाइश) है; अब मुझे दिखाओ कि उसके सिवा दूसरों ने क्या पैदा किया है [17]? बल्कि ज़ालिम लोग खुली गुमराही में हैं [18]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 11

"यह अल्लाह की मख़्लूक़ (पैदाइश) है; अब मुझे दिखाओ कि उसके सिवा दूसरों ने क्या पैदा किया है [17]? बल्कि ज़ालिम लोग खुली गुमराही में हैं [18]!"

[17] बुतपरस्तों को सीधा चैलेंज

यह आयत काफ़िरों और बुतपरस्तों को सीधा चैलेंज पेश करती है, जो यह तो मानते हैं कि अल्लाह ही हर चीज़ का ख़ालिक़ है। वे ख़ुद भी यह दावा नहीं करते कि उनके बुतों ने कुछ पैदा किया है। जब यह एअतिराफ़ मौजूद है, तो फिर सवाल पैदा होता है: उसकी इबादत क्यों की जाए जिसने कुछ भी पैदा नहीं किया, और उस ज़ात से क्यों मुंह मोड़ा जाए जिसने सब कुछ पैदा किया है?

यह अक़्ली दलील शिर्क के खोखलेपन को पूरी तरह बे-नक़ाब करती है—और इस तज़ाद को वाज़ेह करती है कि अल्लाह की क़ुदरत को मानते हुए भी बे-जान बुतों के आगे माथा टेकना कितनी बड़ी जहालत है।

[18] ज़ुल्म और सरीह गुमराही

आयत के आख़िर में ऐसे लोगों को “ज़ालिम” और खुली गुमराही में मुब्तला क़रार दिया गया। क़ुरआनी इस्तेलाह में “ज़ुल्म” से मुराद सबसे पहले शिर्क है, जो सबसे बड़ा ज़ुल्म है। जो लोग इसमें मुब्तला हैं वे सिर्फ़ गुमराह नहीं बल्कि खुली गुमराही में हैं—ऐसी गुमराही जो अक़्ल और हक़ दोनों के बिल्कुल ख़िलाफ़ है।

यह आयत अल्लाह की तख़लीक़ी ताक़त की यकताई को साबित करती है और बुतपरस्ती की बे-बुनियादी को ज़ाहिर करके इंसान को अपने सच्चे ख़ालिक़ के सामने झुकने की दावत देती है।

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