Transliteration: (Wa iz qaala luqmaanu libnihee wa huwa ya'izuhoo ya bunaiya laa tushrik billaah; innash shirka lazulmun azeem)
"और (याद करो) जब लुक़मान ने अपने बेटे से कहा, जबकि वे उसे नसीहत कर रहे थे, 'ऐ मेरे प्यारे बेटे! अल्लाह के साथ किसी को शरीक न ठहराना; बेशक शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है [24]।"
तफ़सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में रिवायत है कि हज़रत लुक़मान के साहबज़ादे का नाम अनअम या अशकन था। इस आयत से कई अहम असबाक़ मिलते हैं:
नसीहत की इब्तिदा अपने घर वालों से करनी चाहिए, इससे पहले कि दूसरों को दावत दी जाए। हज़रत लुक़मान ने अपनी नसीहत का आग़ाज़ अपने बेटे से किया, जो एक ज़िम्मेदार और पैग़म्बराना किरदार को दिखाता है।
नसीहत का अंदाज़ बेहद अहम है—नरम और मुहब्बत भरे अलफ़ाज़ दिल पर ज़्यादा असर करते हैं। हज़रत लुक़मान ने फ़रमाया, “ऐ मेरे प्यारे बेटे!”, जिसमें शफ़क़त, आजिज़ी और अपनाइयत झलकती है—ऐसी सिफ़ात जो दिल में एतमाद पैदा करती हैं।
रूहानी तालीम में अक़ीदा आमाल से पहले आता है। हज़रत लुक़मान ने पहले ईमान की इस्लाह फ़रमाई, अपने बेटे को शिर्क से बचने की ताकीद की, इससे पहले कि आमाल की बात करते। दुरूस्त अक़ीदा ही तमाम नेक आमाल की बुनियाद है।
यहाँ शिर्क को मुकम्मल कुफ़्र के बराबर ठहराया गया है। नसीहत का मक़सद यह नहीं कि कुफ़्र की एक क़िस्म से बचा जाए और दूसरी की इजाज़त हो; बल्कि यह कुफ़्र की तमाम क़िस्मों को रद्द करने की जामेअ दावत है।
इससे यह भी साबित होता है कि ईमान वालों को भी मुसलसल कुफ़्र व शिर्क से बचने की यादहानी करानी चाहिए—ताकि उनका ईमान मज़बूत रहे और वे हक़ पर साबित-क़दम रहें।
यह आयत क़ुरआन के इस तरीक़ा-ए-कार को भी उजागर करती है कि गुज़रे हुए नेक बुज़ुर्गों की हिकमतों को याद दिलाया जाए। अहले हक़ और औलिया के अक़वाल को बयान करना एक इलाही सुन्नत है, जो अख़लाक़ी और रूहानी हिदायत का बेहतरीन ज़रिया है।
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