कुरान - 31:14 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حَمَلَتۡهُ أُمُّهُۥ وَهۡنًا عَلَىٰ وَهۡنٖ وَفِصَٰلُهُۥ فِي عَامَيۡنِ أَنِ ٱشۡكُرۡ لِي وَلِوَٰلِدَيۡكَ إِلَيَّ ٱلۡمَصِيرُ

Transliteration: (Wa wassainal insaana bi waalidaihi hamalat hu ummuhoo wahnan 'alaa wahninw wa fisaaluhoo fee 'aamaini anishkur lee wa liwaalidaika ilaiyal maseer)

और हमने इंसान को उसके वालिदैन के बारे में ताकीद की [25]—उसकी माँ ने कमज़ोरी पर कमज़ोरी सहते हुए [26] उसे पेट में उठाए रखा, और दो साल में उसका दूध छुड़ाना है [27]—कि 'मेरा शुक्र अदा कर और अपने वालिदैन का भी [28]; मेरी ही तरफ़ वापसी है।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 14

"और हमने इंसान को उसके वालिदैन के बारे में ताकीद की [25]—उसकी माँ ने कमज़ोरी पर कमज़ोरी सहते हुए [26] उसे पेट में उठाए रखा, और दो साल में उसका दूध छुड़ाना है [27]—कि 'मेरा शुक्र अदा कर और अपने वालिदैन का भी [28]; मेरी ही तरफ़ वापसी है।"

[25] वालिदैन के हुक़ूक़ की अज़मत

यह आयत हज़रत लुक़मान की नसीहतों के दर्मियान एक इलाही हुक्म के तौर पर आई है, जो वालिदैन की ख़िदमत के आला मक़ाम को उजागर करती है। अगर किसी के वालिदैन काफ़िर भी हों, तब भी उनके वालिदैन होने के हुक़ूक़ बाक़ी रहते हैं और उनकी ख़िदमत लाज़िम है। यह दिखाता है कि औलाद की ज़िम्मेदारी अक़ीदे के इख़्तिलाफ़ से ऊपर है और बुनियादी इंसानी अख़लाक़ व इलाही हुक्म पर मब्नी है।

[26] माँ की अज़ीम क़ुर्बानियाँ

माँ का ख़ास ज़िक्र उन बे-पनाह तक़लीफ़ों की वजह से किया गया जो वह बर्दाश्त करती है: हमल का बोझ, विलादत का दर्द, और परवरिश की सख़्तियाँ। “कमज़ोरी पर कमज़ोरी” का जुमला जिस्मानी और जज़्बाती मुश्किलात को दिखाता है। उलेमा फ़रमाते हैं कि माँ अपने ख़ून से बच्चे को पालती है, जबकि बाप अपने माल से कफ़ालत करता है। इसलिए ख़िदमत में माँ का हक़ ज़्यादा है, जबकि इताअत और माली इख़्तियारात में बाप का दर्जा नुमायां है।

यह तवाज़ुन इन दो मुबारका अहादीस में ख़ूबसूरती से बयान हुआ है:

  • “जन्नत तुम्हारी माँओं के क़दमों तले है” – ख़िदमत के ज़रिए उसकी रूहानी अज़मत।

  • “तू और तेरा माल तेरे बाप का है” – माली मुआम्लात में बाप की विलायत और हक़।

[27] दूध पिलाने की मुद्दत

आयत यह भी साफ़ करती है कि दूध पिलाने की मुद्दत पूरे दो साल है। जहाँ क़ुरआन में तीस महीने का ज़िक्र आया है, उसमें हमल की कम से कम मुद्दत यानी छह महीने भी शामिल हैं। यह रहनुमाई मादरी देखभाल के तवाज़ुन को वाज़ेह करती है और इस्लामी शरीअत में बच्चे की नशवोनुमा का निज़ाम तय करती है।

[28] अल्लाह और वालिदैन का शुक्र

“मेरा शुक्र अदा कर और अपने वालिदैन का भी” का हुक्म साबित करता है कि वालिदैन का शुक्र अल्लाह के शुक्र से जुड़ा हुआ है। अल्लाह हमारा ख़ालिक़ और हक़ीक़ी राज़िक़ है, जबकि वालिदैन वह ज़ाहिरी ज़रिया हैं जिनके ज़रिए हम दुनिया में आए और परवान चढ़े।

हज़रत सुफ़ियान बिन उयैना (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं कि इंसान पाँचों वक़्त की नमाज़ के ज़रिए अल्लाह का शुक्र अदा करता है, और वालिदैन के हक़ में मग़फ़िरत की दुआएं करके उनका शुक्र अदा करता है, ख़ास तौर पर यह दुआ:
"ऐ मेरे रब! मुझे और मेरे वालिदैन को बख़्श दे।"

आयत का इख़्तिताम इस अज़ीम यादहानी पर होता है: “मेरी ही तरफ़ वापसी है।” यह साबित करता है कि हक़ीक़ी मुहासिबा सिर्फ़ अल्लाह के पास है, और तमाम हुक़ूक़—चाहे अल्लाह के हों या बंदों के—का आख़िरत में हिसाब होगा।

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