Transliteration: (Wa in jaahadaaka 'alaaa an tushrika bee maa laisa laka bihee 'ilmun falaa tuti'humaa wa saahib humaa fid dunyaa ma'roofanw wattabi' sabeela man anaaba ilayy; summa ilaiya marji'ukum fa unabbi'ukum bimaa kuntum ta'maloon)
"और अगर वे दोनों तुझ पर ज़ोर डालें कि तू मेरे साथ किसी ऐसी चीज़ को शरीक ठहराए जिसका तुझे कोई इल्म नहीं [29], तो उनकी बात न मान [30]; और दुनिया में उनके साथ भले तरीक़े से गुज़ारा कर [31], और उस शख़्स के रास्ते की पैरवी कर जो मेरी तरफ़ रुजूअ करता है [32]; फिर मेरी ही तरफ़ तुम सबका पलटना है, तब मैं तुम्हें बताऊँगा जो कुछ तुम करते थे।"
इससे मुराद वे वालिदैन हैं जो अपनी औलाद को शिर्क या कुफ़्र पर मजबूर करते हैं। आयत साफ़ फ़रमाती है कि शिर्क की कोई इल्मी या अक़्ली बुनियाद नहीं है। यह महज़ ग़लत गुमान, रस्म-ओ-रिवाज और नफ़्सानी ख़्वाहिशात पर मब्नी है, किसी इलाही दलील पर नहीं। अल्लाह एक और ला-शरीक है, और कोई भी अक़्ली या नक़्ली दलील शिर्क की ताईद नहीं कर सकती।
यहाँ यह बात वाज़ेह कर दी गई कि वालिदैन की इताअत मुतलक़ नहीं है। अगर वे अल्लाह की नाफ़रमानी का हुक्म दें, जैसे शिर्क करना, फ़राएज़ छोड़ना, या शरीअत की हदें तोड़ना, तो उन मामलों में उनकी बात हरगिज़ नहीं मानी जाएगी। यह आयत उसूल तय करती है कि अल्लाह का हुक्म तमाम इंसानी हुक्मों पर मुक़द्दम है, ख़्वाह वे वालिदैन ही क्यों न हों।
अगर किसी के वालिदैन काफ़िर या मुशरिक भी हों, तब भी दुनियावी मुआम्लात में उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक और भले तरीक़े से पेश आना लाज़िम है। इसमें माली मदद, जिस्मानी ख़िदमत, उनकी सख़्ती पर सब्र, और नरमी से बातचीत शामिल है। मोमिन पर लाज़िम है कि वह अपने ईमान पर समझौता किए बग़ैर उनके साथ बेहतरीन रिश्ते क़ायम रखे।
जायज़ उमूर में वालिदैन की ख़िदमत और इताअत की जाए, लेकिन हमेशा नेक और रुजूअ करने वाले बुज़ुर्गों के रास्ते पर चला जाए, चाहे वालिदैन मुख़ालिफ़ ही क्यों न हों। हिदायत की बात नरमी से पेश की जाए, सख़्ती से नहीं।
यह आयत साबित करती है कि सच्चे दीन में औलिया-ए-किराम और बुज़ुर्गाने दीन की मौजूदगी ज़रूरी है, जिनका अमल ख़ुलूस और इलाही तअल्लुक़ का ज़िंदा नमूना होता है।
अल्लाह के नेक बंदे हमेशा शरीअत और हक़ के पैरोकार (मुक़ल्लिद) रहे हैं। उनमें से कोई भी ग़ैर-मुक़ल्लिद या मनमानी करने वाला नहीं था, जो यह दिखाता है कि हक़ और सुन्नत की पैरवी ही सच्चे ईमान और सिद्क़ की अलामत है।
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