कुरान - 31:34 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ ٱلۡغَيۡثَ وَيَعۡلَمُ مَا فِي ٱلۡأَرۡحَامِۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسٞ مَّاذَا تَكۡسِبُ غَدٗاۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسُۢ بِأَيِّ أَرۡضٖ تَمُوتُۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرُۢ

Transliteration: (Innal laaha 'indahoo 'ilmus saa'ati wa yunazzilul ghaisa wa ya'lamu maa fil arhaami wa maa tadree nafsum maazaa taksibu ghadaa; wa maa tadree nafsum bi ayyi ardin tamoot; innal laaha 'Aleemun Khabeer (section 4))

बेशक अल्लाह ही के पास क़यामत का इल्म है, और वही बारिश बरसाता है [76], और जानता है जो कुछ माँओं के पेट में है; और कोई जान नहीं जानती कि वह कल क्या कमाएगी [77], और कोई जान नहीं जानती कि वह किस ज़मीन में मरेगी [78]; बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 34

"बेशक अल्लाह ही के पास क़यामत का इल्म है, और वही बारिश बरसाता है [76], और जानता है जो कुछ माँओं के पेट में है; और कोई जान नहीं जानती कि वह कल क्या कमाएगी [77], और कोई जान नहीं जानती कि वह किस ज़मीन में मरेगी [78]; बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है।"

[76] शाने नुज़ूल: पाँच मग़य्यबात-ए-ख़म्सा

यह आयत हारिस बिन अम्र के सवाल के जवाब में नाज़िल हुई, जिसने हुज़ूर ﷺ से तंज़िया तौर पर पाँच सवाल पूछे थे:

  1. क़यामत कब आएगी?

  2. बारिश कब होगी?

  3. मेरी हामिला बीवी के पेट में लड़का है या लड़की?

  4. मैं कल क्या करूँगा?

  5. मेरी मौत कहाँ होगी?

यह आयत इन पाँचों बातों का जवाब देती है कि ये इलाही इल्म-ए-ग़ैब के ख़ास शोबे हैं, जो अल्लाह की अता के बग़ैर इंसानी रसाई से बाहर हैं।

[77] इंसानी अंदाज़ों की हदबंदी

यहाँ लफ़्ज़ “तदरी” "दरायात" से निकला है, जिसका मतलब है अक़्ली सोच, अंदाज़े या हिसाब-किताब से हासिल होने वाला इल्म। इन पाँचों बातों का क़तई इल्म इंसानी अक़्ल, साइंस या तजरिबात से हासिल नहीं हो सकता। ये ख़ालिस उमूर-ए-ग़ैब हैं जो सिर्फ़ इलाही वही और अता से मालूम हो सकते हैं जब अल्लाह चाहे।

यह साबित करता है कि कोई भी साइंसदान या दाना अल्लाह की अता के बग़ैर इनका क़तई इल्म नहीं रख सकता।

[78] मौत और तक़दीर का इलाही इल्म

किसी भी जान की मौत का मक़ाम सिर्फ़ अल्लाह और क़ब्ज़-ए-रूह पर मुक़र्रर फ़रिश्तों को मालूम होता है। ताहम अल्लाह तआला ने अपने ख़ास मुक़र्रब बंदों को इनमें से बाज़ बातों की ख़बर अता फ़रमाई, जैसे:

  • हज़रत सारा और हज़रत मरयम को उनके बेटों की विलादत की पहले से ख़बर दी गई।

  • हज़रत ज़करिया (अलैहिस्सलाम) को हज़रत यह्या की बशारत दी गई।

  • जंग-ए-बदर के मौक़े पर हुज़ूर ﷺ ने काफ़िरों के मरने की एक-एक जगह की निशानदेही फ़रमा दी थी।

ये वाक़िआत साबित करते हैं कि अगरचे ज़ाती इल्म अल्लाह ही के लिए मख़्सूस है, लेकिन वह अपने रसूलों और बरगुज़ीदा बंदों को ग़ैब की ख़बरें अता फ़रमाता है, जैसा कि सूरह अल-जिन्न (72:26-27) में फ़रमाया:

“ग़ैब का जानने वाला तो अपने ग़ैब पर किसी को मुसल्लत नहीं करता, सिवाय अपने पसंदीदा रसूल के...”

पस यह आयत अल्लाह के ज़ाती इल्म-ए-ग़ैब की अज़मत को बयान करती है, और यह साबित करती है कि अंबिया-ए-किराम को यह इल्म इलाही अता और इजाज़त से हासिल होता है—जो ज़ाहिर करता है कि ये दोनों अक़ीदे आपस में पूरी तरह हम-आहंग हैं।

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