Transliteration: (Alam tara annal fulka tajree fil bahri bini'matil laahi li yuriyakum min Aayaatih; inna fee zaalika la Aayaatil likulli sabbaarin shakoor)
"क्या आपने नहीं देखा कि कश्तियाँ समुंदर में अल्लाह के फ़ज़्ल से चलती हैं [67] ताकि वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाए [68]? बेशक इसमें हर सब्र करने वाले, शुक्रगुज़ार के लिए बड़ी निशानियाँ हैं [69]।"
इस आयत से दो अज़ीम नुक़ात वाज़ेह होते हैं:
समुंदर में जहाज़ों और कश्तियों का चलना महज़ अल्लाह के फ़ज़्ल से है। अगरचे समुंदर बे-पनाह ख़तरों से भरा है—तूफ़ानी हवाएं, सरकश लहरें और छुपी चट्टानें—लेकिन यह अल्लाह की रहमत है जो कश्तियों को सलामती से मंज़िल तक पहुँचाती है।
पानी एक हल्का सैयाल (तरल) है, जो बजाहिर भारी जहाज़ों का वज़न उठाने से क़ासिर दिखाई देता है, लेकिन अल्लाह ने भारी जहाज़ों को पानी पर तैरने की क़ुव्वत अता फ़रमाई। रूहानी एतबार से यह समझा जाता है कि शरीअत की कश्ती तरीक़त के समुंदर पर तैरती है, और अल्लाह की रहमत से मारिफ़त के साहिल तक पहुँचती है।
ख़ौफ़नाक समंदरों में जहाज़ों का हिफ़ाज़त से सफ़र करना ख़ुद इलाही क़ुदरत की अज़ीम निशानी है। यह क़ुदरत की ताक़तों पर अल्लाह के कामिल इख़्तियार को ज़ाहिर करता है। इंसानों का समंदरों को पार करना, ब-हिफ़ाज़त लौटना और बहरी तिजारत से फ़ायदा उठाना अल्लाह की रहमत की खुली गवाही है।
आयत फ़रमाती है कि इन निशानियों की क़द्र सिर्फ़ वही करते हैं जो सब्र करने वाले और शुक्रगुज़ार हैं। ये एक सच्चे मोमिन की सिफ़ात हैं—मुसीबत में सब्र और नेअमत में शुक्र। अक़्लमंद मोमिन समझता है कि हर कामयाब सफ़र और दुनियावी नेअमत इलाही करम का नतीजा है, न कि महज़ उसकी ज़ाती सलाहियत का।
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