कुरान - 31:32 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَإِذَا غَشِيَهُم مَّوۡجٞ كَٱلظُّلَلِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ فَمِنۡهُم مُّقۡتَصِدٞۚ وَمَا يَجۡحَدُ بِـَٔايَٰتِنَآ إِلَّا كُلُّ خَتَّارٖ كَفُورٖ

Transliteration: (Wa izaa ghashiyahum mawjun kazzulali da'a-wul laaha mukhliseena lahud deena fa lammaa najjaahum ilal barri faminhum muqtasid; wa maa yajhadu bi Aayaatinaa illaa kullu khattaarin kafoor)

और जब उन पर मौज साएबानों (पहाड़ों) की तरह छा जाती है, तो वे अल्लाह को पुकारते हैं अपने दीन को ख़ालिस उसी के लिए करते हुए [70]; फिर जब वह उन्हें बचाकर ख़ुश्की तक पहुंचा देता है, तो उनमें से कोई मियाना-रवी (सीधी राह) पर रहता है [71] (और अक्सर फिर जाते हैं); और हमारी आयात का इंकार सिर्फ़ वही करता है जो बड़ा वादा-ख़िलाफ़, सख़्त ना-शुक्रा हो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 32

"और जब उन पर मौज साएबानों (पहाड़ों) की तरह छा जाती है, तो वे अल्लाह को पुकारते हैं अपने दीन को ख़ालिस उसी के लिए करते हुए [70]; फिर जब वह उन्हें बचाकर ख़ुश्की तक पहुंचा देता है, तो उनमें से कोई मियाना-रवी (सीधी राह) पर रहता है [71] (और अक्सर फिर जाते हैं); और हमारी आयात का इंकार सिर्फ़ वही करता है जो बड़ा वादा-ख़िलाफ़, सख़्त ना-शुक्रा हो।"

[70] मुसीबत में अल्लाह को पुकारना

यह आयत इंसानी फ़ितरत के उस पहलू को बयान करती है कि जब लोग ख़ौफ़नाक ख़तरों में घिर जाते हैं—जैसे समुंदर में पहाड़ों जैसी ऊंची लहरें—तो वे तमाम बुतों और दुनियावी सहारों को भूलकर ख़ालिस अल्लाह को पुकारते हैं। उस वक़्त उनका अक़ीदा शिर्क की मिलावट से पाक हो जाता है, जो यह साबित करता है कि उनके बातिन में यह इक़रार मौजूद है कि सिर्फ़ अल्लाह ही नजात दे सकता है। लेकिन राहत मिलते ही अक्सर लोग उसे भूल जाते हैं।

इसके बरअक्स एक सच्चा मोमिन हर हाल में अल्लाह को याद रखता है—तंगी में भी और आसानी में भी।

[71] हज़रत इक्रमा बिन अबू जहल का वाक़िआ

बाज़ मुफ़स्सिरीन ने इस आयत को हज़रत इक्रमा बिन अबू जहल (रज़ियल्लाहु अन्हु) के वाक़िए से मुताअल्लिक़ बताया है। फ़तह-ए-मक्का के वक़्त जब आम माफ़ी का ऐलान हुआ, तो चार आदमियों को उनकी शदीद दुश्मनी की वजह से मुस्तस्ना रखा गया, जिनमें इक्रमा भी शामिल थे। इक्रमा सफ़र-ए-समंदर पर भाग निकले, लेकिन बीच समंदर में शदीद तूफ़ान में घिर गए।

जब कश्ती डूबने लगी तो मल्लाहों ने पुकारा: "आज सिर्फ़ अल्लाह को पुकारो, तुम्हारे बुत तुम्हें नहीं बचा सकते!" इस हक़ीक़त को देखकर इक्रमा ने अहद किया कि अगर अल्लाह ने उन्हें बचा लिया तो वे सीधे हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर होकर इस्लाम क़बूल कर लेंगे। अल्लाह ने अपनी रहमत से कश्ती को साहिल पर पहुँचा दिया। हज़रत इक्रमा ने अपना वादा पूरा किया और सच्चे मुसलमान बनकर शहादत का मर्तबा पाया। जबकि दूसरे मुशरिक अपने वादे से मुकर गए।

यह वाक़िआ दिखाता है कि सूरह लुक़मान मक्की होने के बावजूद यह आयत मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुई।

निशानियों का इंकार करने वाले दग़ाबाज़ और ना-शुकरे

आयत का इख़्तिताम इस बात पर होता है कि अल्लाह की आयात का इंकार सिर्फ़ वही करते हैं जो दग़ाबाज़ और ना-शुकरे हैं। वे मोजिज़ात और रहमत को अपनी आँखों से देखकर भी इंकार करते हैं। ऐसे लोग अपनी ज़ात से दग़ा करते हैं और अपनी ज़मीर को झुठलाते हैं।

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