Transliteration: (Zaalika bi annal laaha Huwal Haqqu wa anna maa yad'oona min doonihil baatilu wa annal laaha Huwal 'Aliyyul Kabeer (section 3))
"यह इसलिए कि अल्लाह ही हक़ है और जिसे वे उसके सिवा पुकारते हैं वह सब बातिल है [66], और यह कि अल्लाह ही सबसे बुलंद, सबसे बड़ा है।"
यह आयत अल्लाह—जो हक़ीक़ी हक़ है— और उसके सिवा पूजे जाने वाले तमाम बातिल माबूदों के दर्मियान साफ़ फ़र्क़ करती है। “हक़” का लफ़्ज़ दायमी वुजूद, सच्चाई और इलाही हक़ीक़त को ज़ाहिर करता है, जबकि बातिल फ़ना होने वाली, धोखेबाज़ और बे-क़ीमत चीज़ को कहते हैं।
इसका मतलब यह भी है कि सिर्फ़ अल्लाह ही इबादत का मुस्तहिक़ है क्योंकि वही दायमी वुजूद और कामिल सिफ़ात का मालिक है। जबकि बुत—जो मख़लूक़, बे-जान और मोहताज हैं—न तो कोई बुलंदी रखते हैं और न कोई क़ुदरत। उनमें अज़मत की कोई सिफ़त नहीं, इसलिए वे इबादत के लायक़ नहीं हैं।
इसके अलावा आयत में “जिसे वे पुकारते हैं” के लिए ऐसा ज़मीर इस्तेमाल हुआ जो बे-जान चीज़ों के लिए आता है, यह दिखाने के लिए कि अक्सर झूठे माबूद—पत्थर, दरख़्त और तराशी हुई मूर्तियाँ—अक़्ल और शऊर से बिल्कुल ख़ाली हैं। यह बुतपरस्ती की बे-अक़्ली को साबित करता है।
जहाँ तक उन लोगों का तअल्लुक़ है जो ग़लती से अंबिया की परस्तिश करने लगे, क़ुरआन अंबिया को बातिल माबूद नहीं कहता, क्योंकि अंबिया ख़ुद हक़ का मुजस्समा हैं और उन्होंने कभी अपनी इबादत की दावत नहीं दी। पस जुर्म शिर्क करने वालों का है, अंबिया की ज़ात इससे बिल्कुल बरी है।
आयत का इख़्तिताम इस पर होता है कि सिर्फ़ अल्लाह ही सबसे बुलंद और सबसे बड़ा है। कब्रयाई और बुजु़र्गी सिर्फ़ उसी की ज़ात के लिए मख़्सूस है, जो साबित करती है कि इबादत का हक़ भी सिर्फ़ उसी का है।
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