Transliteration: (Wa laqad aatainaa Luqmaanal hikmata anishkur lillaah; wa many yashkur fa innamaa yashkuru linafsihee wa man kafara fa innal laaha Ghaniyyun Hameed)
"और बेशक हमने लुक़मान [19] को हिकमत [20] अता फ़रमाई कि 'अल्लाह का शुक्र अदा करो [21];' और जो कोई शुक्र अदा करता है वह अपनी ही ज़ात के भले के लिए शुक्र करता है [22], और जो कोई ना-शुक्री करता है तो बेशक अल्लाह बे-नियाज़ [23], हर तारीफ़ के लायक़ है।"
हज़रत लुक़मान (अलैहिर्रहमा) की शख़्सियत के बारे में उलेमा के दर्मियान मुख़्तलिफ़ अक़वाल हैं। कुछ का क़ौल है कि वे लुक़मान बिन बाऊरा बिन तारूख़ थे, जो हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) के हम-अस्र थे, और हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के वालिद तारूख़ के घराने से थे। बाज़ ने कहा कि वे लुक़मान बिन अनक़ा बिन सरवान थे, जो अहल-ए-ऐला में से एक हबशी ग़ुलाम थे। बाज़ मुफ़स्सिरीन का कहना है कि वे बनी इसराईल के क़ाज़ी और वली थे, जबकि बाज़ ने उन्हें हज़रत अय्यूब (अलैहिस्सलाम) का रिश्तेदार बताया है।
जमहूर उलेमा का पसंदीदा क़ौल यह है कि वे नबी नहीं थे, बल्कि एक अज़ीम हकीम और वली-उल्लाह थे, जिन्हें अल्लाह ने ख़ास हिकमत अता फ़रमाई थी। यह हिकमत सिर्फ़ ज़हानत नहीं थी बल्कि रूहानी बसीरत और बातिनी नूर था—जिससे हक़, भलाई और मक़सद-ए-ज़िंदगी की पहचान होती है।
हज़रत लुक़मान को मिलने वाली हिकमत इलाही अता थी जो सीधे अल्लाह की तरफ़ से मिली थी—यह महज़ मुताले या अक़्ल से हासिल की हुई नहीं थी। यह नबी न होने के बावजूद हज़रत लुक़मान के आला रूहानी मक़ाम को ज़ाहिर करती है।
यहाँ हिकमत में रूहानी हक़ाइक़ का इल्म, नेक किरदार की समझ, और अपनी ज़ात और दूसरों को नेकी की राह दिखाने की सलाहियत शामिल है।
हज़रत लुक़मान को सबसे पहला हुक्म यह दिया गया: “अल्लाह का शुक्र अदा करो”। शुक्रगुज़ारी हिकमत की बुनियाद है, क्योंकि यह अल्लाह को तमाम नेअमतों का सरचश्मा मानती है, ख़ास तौर पर हिकमत जैसी नेअमत, जो सबसे बड़ी इलाही नेअमतों में से है।
बाज़ उलेमा इसे अंबिया-ए-किराम की सोहबत पर शुक्रगुज़ारी भी क़रार देते हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा एज़ाज़ है।
यह आयत साबित करती है कि शुक्र अदा करने का फ़ायदा ख़ुद इंसान को पहुँचता है। शुक्र से नेअमतों में इज़ाफ़ा होता है, जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है: “अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं तुम्हें और ज़्यादा दूंगा” (सूरह इब्राहीम, 14:7)। पस, शुक्र का बदला इंसान की तरफ़ ही लौटता है इलाही इज़ाफ़े, रहमत और रूहानी तरक़्क़ी की शक्ल में।
यहाँ “कुफ़्र” का लफ़्ज़ “कुफ़्रान-ए-नेअमत” यानी ना-शुक्री के मफ़हूम में है। जो ना-शुक्री करता है वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ता—बल्कि वह अपनी ही ज़ात को नुक़सान पहुँचाता है। अल्लाह बे-नियाज़ और हर तारीफ़ का हक़दार है, उसे मख़लूक़ की इबादत या इंकार की कोई हाजत नहीं। इंसानों का कुफ़्र या ना-शुक्री उसकी शान में ज़र्रा बराबर कमी नहीं कर सकती।
यह आयत हिकमत और शुक्रगुज़ारी को आपस में जोड़ती है, और सिखाती है कि इलाही नेअमतें शुक्र से बढ़ती हैं, जबकि ना-शुक्री ख़ुद इंसान के लिए तबाही लाती है।
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