कुरान - 19:55 सूरह मरयम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
وَكَانَ يَأۡمُرُ أَهۡلَهُۥ بِٱلصَّلَوٰةِ وَٱلزَّكَوٰةِ وَكَانَ عِندَ رَبِّهِۦ مَرۡضِيّٗا

Transliteration: (Wa kaana ya'muru ahlahoo bis Salaati waz zakaati wa kaana 'inda Rabbihee mardiyyaa)

और वे अपने घर वालों को नमाज़ और ज़कात का हुक्म दिया करते थे, और वे अपने रब के नज़दीक पसंदीदा (मक़बूल) थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मरयम आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह मरयम - आयत 55

✅ घर वालों को नमाज़ व ज़कात की ताकीद

हज़रत इस्माईल न सिर्फ़ खुद इबादत करते थे बल्कि अपने घर वालों और क़ौम को भी नमाज़ क़ायम करने और ज़कात देने की लगातार ताकीद फ़रमाते थे। यह हर सरबराह का फ़र्ज़ है कि वह अपने अहलो-अयाल की दीनी तरबियत करे।

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