कुरान - 12:50 सूरह यूहफ़़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

50
وَقَالَ ٱلۡمَلِكُ ٱئۡتُونِي بِهِۦۖ فَلَمَّا جَآءَهُ ٱلرَّسُولُ قَالَ ٱرۡجِعۡ إِلَىٰ رَبِّكَ فَسۡـَٔلۡهُ مَا بَالُ ٱلنِّسۡوَةِ ٱلَّـٰتِي قَطَّعۡنَ أَيۡدِيَهُنَّۚ إِنَّ رَبِّي بِكَيۡدِهِنَّ عَلِيمٞ

Transliteration: (Wa qaalal maliku'toonee bihee falammaa jaaa'ahur rasoolu qaalar-ji ilaa rabbika fas'alhu maa baalun niswatil laatee qatta'na aydiyahunn; inna Rabbee bikaidihinna 'Aleem)

और राजा ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ!" फिर जब दूत (क़ासिद) यूसुफ़ के पास आया, तो उन्होंने कहा, "अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियों का क्या मामला है जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे? निस्संदेह, मेरा रब उनकी चालबाज़ियों को भली-भाँति जानता है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह यूहफ़़ आयत 50 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह यूसुफ़ – आयत 50 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] आत्म-सम्मान और चरित्र की पूर्ण निष्कलंकता का आग्रह

जब राजा ने तुरंत रिहाई का फ़रमान भेजा, तो हज़रत यूसुफ़ ने किसी अपराधी की तरह चुपचाप जेल से निकलने से इंकार कर दिया। उन्होंने शर्त रखी कि पहले उन महिलाओं और ज़ुलैख़ा के षड्यंत्र की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो ताकि पूरे मिस्र के सामने यह साबित हो जाए कि यूसुफ़ निर्दोष था। यह नबी के बेदाग़ चरित्र और आत्म-सम्मान का अद्वितीय उदाहरण है।

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