Transliteration: (Kazaalika wa awrasnaahaa qawman aakhareen)
"यूँ ही हुआ, और हमने दूसरी क़ौम को उनका वारिस बना दिया [27] (उनकी तमाम चीज़ों का)।"
यह आयत फ़िरऔन की हलाकत के नतीजे को बयान फ़रमाती है—कि वह तमाम दौलत, महल, बागात और सरसब्ज़ ज़मीनें जो फ़िरऔनियों के क़ब्ज़े में थीं, अल्लाह ने एक दूसरी क़ौम यानी बनी इसराईल का विरसा बना दीं। यह अल्लाह का मुस्तक़िल क़ानून है कि जब कोई क़ौम तकब्बुर और कुफ़्र में हद से बढ़ जाती है, तो उसकी हुकूमत छीनकर उन मज़लूमों को दे दी जाती है जिन्हें वे हक़ीर समझते थे।
इस आयत से एक अहम फ़िक़्ही मसला भी मुस्तंबत होता है: काफ़िरों के मुल्क में आबाद होना मुतलक़न हराम नहीं है। सिर्फ़ उन जगहों पर ठहरना मना है जहाँ ज़मीन पर अज़ाब नाज़िल हुआ हो (जैसे क़ौम-ए-समूद या सदूम की बस्तियाँ)। मिस्र के मामले में अज़ाब फ़िरऔन और उसके लश्कर पर दरिया (बहर-ए-अहमर) में आया था, ज़मीन पर नहीं। इसलिए बनी इसराईल के लिए मिस्र में सुकूनत इख़्तियार करना बिल्कुल जाइज़ रहा।
दूसरा मसला यह कि काफ़िरों का छोड़ा हुआ माल जब शरीअत के मुताबिक़ हासिल हो, तो वह अहले-ईमान के लिए हलाल और तैयब बन जाता है।
सूरह अल-आराफ़ (7:129 और 7:137) में भी इसका बयान आया है कि अल्लाह ने मज़लूमों को ज़मीन के मशरिक़ व मग़रिब का वारिस बना दिया। अल्लाह मुतक़ब्बिरीन को ज़लील करके आजिज़ों को सरबुलंद फ़रमाता है।
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