Transliteration: (Famaa bakat 'alaihimus samaaa'u wal ardu wa maa kaanoo munzareen)
"तो न आसमान और ज़मीन उन पर रोए [28], और न ही उन्हें कोई मोहलत दी गई [29]।"
यह आयत एक अज़ीम रूहानी हक़ीक़त को बेनक़ाब करती है—कि आसमान और ज़मीन इंसानों की ज़िंदगी और मौत से मुतअस्सिर होते हैं, ख़ास तौर पर उनके ईमान या कुफ़्र के सबब। जब कोई सच्चा मोमिन इस दुनिया से रुख़सत होता है, तो ज़मीन का वह हिस्सा जहाँ वह नमाज़ पढ़ता और सजदा करता था, और आसमान के वे दरवाज़े जिनसे उसके नेक आमाल और दुआएं चढ़ती थीं, सब उसके फ़िराक़ पर रोते हैं।
हदीस-ए-पाक और तफ़सीर में आया है कि एक सच्चे मोमिन के इंतिक़ाल पर आसमान और ज़मीन चालीस दिन तक रोते हैं, क्योंकि कायनात उनके ज़िक्र-ओ-इबादत के ख़ाली होने का दर्द महसूस करती है।
लेकिन इसके बरअक्स, जब फ़िरऔन और उसके साथी, जो सरकशी और कुफ़्र में डूबे हुए थे, हलाक हुए तो न आसमान उनके लिए रोया और न ज़मीन ने कोई आँसू बहाया। उनकी ज़िंदगी से कायनात में कोई ख़ैर व बरकत नहीं फैली थी, बल्कि वे ज़ुल्म व फ़साद का सबब थे। इसलिए उनके मिटने पर पूरी कायनात ने राहत महसूस की।
यही वजह है कि हज़रत सय्यिदुना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के वक़्त आसमान का ख़ून के आँसू रोना रिवायतों में साबित है, जो इस बात की दलील है कि बारगाह-ए-इलाही के मक़बूल बंदों के जाने पर पूरी कायनात रंजीदा होती है।
फ़रमाया “और न ही उन्हें कोई मोहलत दी गई”—यानी बार-बार के मोजिज़ात और चेतावनियों के बावजूद जब उन्होंने हक़ को मुस्तर्द कर दिया, तो अज़ाब के वक़्त उन्हें एक लम्हे की भी ताख़ीर या तौबा का मौक़ा नहीं मिला।
अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है, लेकिन जब सरकशी हद से गुज़र जाए और तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए, तो फिर इलाही पकड़ फ़ौरन और लाज़िमी तौर पर आ घेरती है।
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