कुरान - 46:13 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

13
إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُواْ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسۡتَقَٰمُواْ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ

Transliteration: (Innal lazeena qaaloo Rabbunal laahu summas taqaamoo falaa khawfun 'alaihim wa laahum yahzanoon)

बेशक जिन्होंने कहा: "हमारा रब अल्लाह है [34]", फिर उस पर साबित-क़दम रहे [35], तो उन पर न कोई ख़ौफ़ [36] होगा और न वे ग़मगीन होंगे [37]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 13 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 13

"बेशक जिन्होंने कहा: 'हमारा रब अल्लाह है [34]', फिर उस पर साबित-क़दम रहे [35], तो उन पर न कोई ख़ौफ़ [36] होगा और न वे ग़मगीन होंगे [37]।"

[34] सच्चे दिल से तौहीद का इक़रार

यानी जिन्होंने ज़बान और दिल से इक़रार किया कि हमारा माबूद, ख़ालिक़ और परवरदिगार सिर्फ़ अल्लाह तआला है।

[35] इस्seqामत (साबित-क़दमी) की अज़ीम फ़ज़ीलत

ईमान लाने के बाद अपनी आख़िरी साँस तक उसी अक़ीदे पर जमे रहे, दुनिया की कोई लालच, ज़ुल्म या आज़माइश उनके क़दमों को डगमगा न सकी। ‘इस्तिक़ामत’ तमाम करामातों से बढ़कर करामत है। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया: “इस्तिक़ामत यह है कि इंसान कभी शिर्क और कुफ़्र की तरफ़ आँख उठाकर भी न देखे”।

[36-37] ख़ौफ़ और ग़म से मुकम्मल हिफ़ाज़त

मौत के वक़्त, क़ब्र में और क़ियामत के दिन उन्हें न आइंदा का कोई ख़ौफ़ होगा और न पीछे छूटने वाली दुनिया का कोई मलाल। फ़रिश्ते उन्हें जन्नत की खुशख़बरी देंगे।

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