कुरान - 46:35 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

35
فَٱصۡبِرۡ كَمَا صَبَرَ أُوْلُواْ ٱلۡعَزۡمِ مِنَ ٱلرُّسُلِ وَلَا تَسۡتَعۡجِل لَّهُمۡۚ كَأَنَّهُمۡ يَوۡمَ يَرَوۡنَ مَا يُوعَدُونَ لَمۡ يَلۡبَثُوٓاْ إِلَّا سَاعَةٗ مِّن نَّهَارِۭۚ بَلَٰغٞۚ فَهَلۡ يُهۡلَكُ إِلَّا ٱلۡقَوۡمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ

Transliteration: (Fasbir kamaa sabara ulul 'azmi minar Rusuli wa laa tasta'jil lahum; ka annahum Yawma yarawna maa yoo'adoona lam yalbasooo illaa saa'atam min nahaar; balaagh; fahal yuhlaku illal qawmul faasiqoon (section 4))

तो आप सब्र फ़रमाइए जैसा कि हिम्मत वाले (उलुल अज़्म) रसूलों ने सब्र किया [96], और उनके लिए (अज़ाब की) जल्दी न फ़रमाइए [97]। जिस दिन [98] वे उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है [99], तो (उन्हें ऐसा मालूम होगा) गोया वे दुनिया में दिन की एक घड़ी भर ही ठहरे थे। यह पैग़ाम पहुँचा दिया गया; तो नाफ़रमान लोगों के सिवा कौन हलाक किया जाएगा? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 35 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 35

"तो आप सब्र फ़रमाइए जैसा कि हिम्मत वाले (उलुल अज़्म) रसूलों ने सब्र किया [96], और उनके लिए (अज़ाब की) जल्दी न फ़रमाइए [97]। जिस दिन [98] वे उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है [99], तो (उन्हें ऐसा मालूम होगा) गोया वे दुनिया में दिन की एक घड़ी भर ही ठहरे थे। यह पैग़ाम पहुँचा दिया गया; तो नाफ़रमान लोगों के सिवा कौन हलाक किया जाएगा?"

[96] पाँच उलुल अज़्म रसूल और हुज़ूर ﷺ का सबसे आला मुक़ाम

पाँच उलुल अज़्म (साहिब-ए-अज़ीमत) रसूल ये हैं:

  1. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम

  2. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम

  3. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम

  4. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम

  5. और इन सब के सरदार हुज़ूर नबी-ए-अकरम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ।

हुज़ूर ﷺ का सब्र और इस्तिक़ामत तमाम कायनात में सबसे आला और बेमिसाल है।

[97] अज़ाब की जल्दी न फ़रमाना

काफ़िर मज़ाक़ में अज़ाब की जल्दी मांगते थे। अल्लाह ने हुज़ूर ﷺ को तसल्ली दी कि आप सब्र फ़रमाएं, अल्लाह का अज़ाब अपने मुक़र्ररा वक़्त पर आकर रहेगा।

[98] यौम-ए-हक़ीक़त (क़ियामत का दिन)

यहाँ उस दिन से मुराद क़ियामत का दिन है जब हर मुनकिर अपनी आँखों से अज़ाब को देख लेगा।

[99] दुनियावी ज़िंदगी महज़ एक घड़ी

आख़िरत के अज़ाब की शिद्दत और दायमी हयात के सामने काफ़िरों को महसूस होगा कि उनकी पूरी दुनियावी ज़िंदगी महज़ एक दिन की चंद घड़ियाँ थीं। यह सूरह इस नसीहत पर ख़त्म होती है कि अल्लाह का पैग़ाम पूरी तरह पहुँचा दिया गया है, और हलाकत सिर्फ़ उन्हीं की होगी जो सरकशी और नाफ़रमानी पर अड़े रहे।

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