Transliteration: (Wa iz sarafinaaa ilaika nafaram minal jinni yastami'oonal Quraana falammaa hadaroohu qaalooo ansitoo falammaa qudiya wallaw ilaa qawmihim munzireen)
"और (ऐ महबूब!) याद कीजिए जब हमने जिन्नों के एक गिरोह को आपकी तरफ़ मुतवज्जोह फ़रमाया [81] जो क़ुरआन कान लगाकर सुन रहे थे; फिर जब वे वहाँ हाज़िर हुए, तो उन्होंने (आपस में) कहा: 'ख़ामोश रहो [82]'! फिर जब तिलावत मुकम्मल हो गई, तो वे अपनी क़ौम की तरफ़ डराने वाले बनकर [83] लौटे।"
हुज़ूर अकरम ﷺ जब तायफ़ के सफ़र से वापसी पर वादी-ए-नख़ला में फ़ज्र की नमाज़ में क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत फ़रमा रहे थे, तो नसीबैन के जिन्नों का एक गिरोह वहाँ से गुज़रा और आपकी मुबारक आवाज़ सुनकर रुक गया।
यह इस बात की अज़ीम दलील है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ सिर्फ़ इंसानों ही के नहीं बल्कि जिन्नों के भी रसूल हैं (रसूल-उस-स़क़लैन)। आपकी रिसालत तमाम कायनात पर मुहीत है।
जिन्नों ने जब कलाम-ए-इलाही सुना तो आपस में कहा कि बिल्कुल ख़ामोश हो जाओ और अदब से सुनो। इससे मालूम हुआ कि क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत के वक़्त ख़ामोशी और अदब इख़्तियार करना लाज़िम है।
क़ुरआन सुनते ही वे ईमान ले आए और फ़ौरन अपनी क़ौम में जाकर उन्हें हक़ की दावत देने लगे और अज़ाब से डराने वाले दाई बन गए।
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