कुरान - 46:31 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

31
يَٰقَوۡمَنَآ أَجِيبُواْ دَاعِيَ ٱللَّهِ وَءَامِنُواْ بِهِۦ يَغۡفِرۡ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمۡ وَيُجِرۡكُم مِّنۡ عَذَابٍ أَلِيمٖ

Transliteration: (Yaa qawmanaaa ajeeboo daa'iyal laahi wa aaminoo bihee yaghfir lakum min zunoobikum wa yujirkum min 'azaabin aleem)

"ऐ हमारी क़ौम! अल्लाह के दाई (मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ) की बात क़बूल करो [88] और उन पर ईमान लाओ, ताकि वह तुम्हारे गुनाह बख़्श दे [89] और तुम्हें दर्दनाक अज़ाब से बचा ले [90]"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 31 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 31

"'ऐ हमारी क़ौम! अल्लाह के दाई (मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ) की बात क़बूल करो [88] और उन पर ईमान लाओ, ताकि वह तुम्हारे गुनाह बख़्श दे [89] और तुम्हें दर्दनाक अज़ाब से बचा ले [90]'।"

[88] दाई-ए-इलाही: हुज़ूर अकरम ﷺ की मुबारक ज़ात

जिन्नों ने अपनी क़ौम से पुकार कर कहा कि अल्लाह के सच्चे दाई यानी हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की दावत को लब्बैक कहो। हुज़ूर ﷺ अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाले अज़ीम पैग़म्बर हैं।

[89-90] मग़फ़िरत और नजात की बशारत

जो शख़्स या जिन्न हुज़ूर ﷺ पर ईमान ले आएगा, अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ फ़रमा देगा और उसे दोज़ख़ के दर्दनाक अज़ाब से बचा लेगा। इससे साबित हुआ कि ईमान ही नजात की बुनियादी शर्त है।

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