कुरान - 46:32 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَمَن لَّا يُجِبۡ دَاعِيَ ٱللَّهِ فَلَيۡسَ بِمُعۡجِزٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَيۡسَ لَهُۥ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءُۚ أُوْلَـٰٓئِكَ فِي ضَلَٰلٖ مُّبِينٍ

Transliteration: (Wa mal laa yujib daa'iyal laahi falaisa bimu'jizin fil ardi wa laisa lahoo min dooniheee awliyaaa'; ulaaa ika fee dalaalim mubeen)

"और जो शख़्स अल्लाह के दाई की बात न मानेगा, तो वह ज़मीन में (अल्लाह को) आजिज़ नहीं कर सकता, और न ही अल्लाह के सिवा उसका कोई मददगार होगा; ऐसे ही लोग खुली गुमराही [91] में हैं"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 32

"'और जो शख़्स अल्लाह के दाई की बात न मानेगा, तो वह ज़मीन में (अल्लाह को) आजिज़ नहीं कर सकता, और न ही अल्लाह के सिवा उसका कोई मददगार होगा; ऐसे ही लोग खुली गुमराही [91] में हैं'।"

[91] रसूल की नाफ़रमानी खुली गुमराही है

जो कोई हुज़ूर अकरम ﷺ की दावत को ठुकराएगा, वह अल्लाह की पकड़ से भाग नहीं सकता और न कोई उसका मददगार बन सकेगा। ऐसा मुनकिर खुली गुमराही और दायमी हलाकत में पड़ा हुआ है।

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