Transliteration: (Wa wassainal insaana biwaalidaihi ihsaana; hamalat hu ummuhoo kurhanw-wa wada'at hu kurhanw wa hamluhoo wa fisaaluhoo salaasoona shahraa; hattaaa izaa balagha ashuddahoo wa balagha arba'eena sanatan qaala Rabbi awzi' neee an ashkura ni'matakal lateee an'amta 'alaiya wa 'alaa waalidaiya wa an a'mala saalihan tardaahu wa aslih lee fee zurriyyatee; innee tubtu ilaika wa innee minal muslimeen)
"और हमने इंसान को अपने वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक [38] का हुक्म दिया। उसकी माँ ने उसे तकलीफ़ से पेट में रखा [39] और तकलीफ़ ही से उसे जना; और उसका हमल और उसका दूध छुड़ाना तीस महीने में हुआ; यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस साल [41] का हुआ, तो उसने अर्ज़ की: 'ऐ मेरे रब! मुझे तौफ़ीक़ दे [42] कि मैं तेरी उस नेअमत का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझ पर और मेरे वालिदैन पर फ़रमाई, और यह कि मैं ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो [43], और मेरे लिए मेरी औलाद में सलाहियत (नेकी) [44] रख दे; बेशक मैं तेरी तरफ़ रुजूअ़ लाया और बेशक मैं फ़रमांबरदारों [45] में से हूँ'।"
अल्लाह तआला ने माँ-बाप के साथ जान, माल और अदब-ओ-एहतिराम के साथ भलाई करने का सख़्त हुक्म दिया है। अगर माँ-बाप ग़ैर-मुस्लिम भी हों, तब भी दुनियावी उमूर में उनकी ख़िदमत और अदब करना लाज़िम है।
माँ ने नौ महीने तकलीफ़ के साथ बच्चे को पेट में पाला, फिर विलादत की जानलेवा तकलीफ़ सही और अपने ख़ून से उसे दूध पिलाया। इसी वजह से माँ का हक़ बाप के हक़ से तीन गुना ज़्यादा बयान फ़रमाया गया है।
हमल और दूध छुड़ाने की मजमूई मुद्दत तीस महीने बयान की गई है। हज़रत इमाम आज़म अबू हनीफ़ा, इमाम अबू यूसुफ़ और इमाम मुहम्मद रहमतुल्लाह अलैहिम ने इससे यह फ़िक़्ही मसला मुस्तंबत फ़रमाया कि हमल की कम से कम मुद्दत छः (6) महीने है, और दूध पिलाने की मुद्दत दो साल (24 महीने) है। इमाम आज़म के नज़दीक एहतियातन दूध पिलाने की मुद्दत ढाई साल (30 महीने) तक भी जाइज़ है।
यह पूरी आयत-ए-मुबारका ख़ास तौर पर ख़लीफ़ा-ए-अव्वल सय्यिदुना हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की शान में नाज़िल हुई। आप अट्ठारह साल की उम्र में हुज़ूर ﷺ के साथ तिजारत के सिलसिले में मुल्क-ए-शाम गए, जहाँ बहीरा राहिब ने हुज़ूर ﷺ के आख़िरी नबी होने की गवाही दी। जब हुज़ूर ﷺ ने नुबूवत का ऐलान फ़रमाया तो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की उम्र अड़तीस साल थी और आपने बे-धड़क सबसे पहले इस्लाम क़बूल किया। चालीस साल की उम्र में आपने यह अज़ीम दुआ मांगी जो इस आयत में दर्ज है।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़ास फ़ज़ीलत यह है कि आपके वालिद हज़रत अबू क़हाफ़ा और वालिदा उम्मुल ख़ैर दोनों सहाबी बने और बा-ईमान दुनिया से रुख़सत हुए।
आपकी यह दुआ पूरी तरह क़बूल हुई। आप क़ुरआन-ए-पाक के पहले जामेअ़ बने, मर्दों में सबसे पहले ईमान लाए, और हुज़ूर ﷺ के यारे-ग़ार व यारे-मज़ार बने। हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते थे कि “काश मेरी तमाम उम्र की नेकियाँ अबू बक्र की उस ग़ार वाली एक रात की नेकी के बराबर हो जाएं”।
आपकी औलाद में भी अल्लाह ने नेकी का नूर अता फ़रमाया—हज़रत आयशा सिद्दीक़ा, हज़रत अस्मा, हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर, और आपका नसब हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से भी जा मिला।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ ने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की फ़रमांबरदारी और फ़िदाकारिता में बसर फ़रमाई।
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