कुरान - 46:20 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

20
وَيَوۡمَ يُعۡرَضُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ عَلَى ٱلنَّارِ أَذۡهَبۡتُمۡ طَيِّبَٰتِكُمۡ فِي حَيَاتِكُمُ ٱلدُّنۡيَا وَٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِهَا فَٱلۡيَوۡمَ تُجۡزَوۡنَ عَذَابَ ٱلۡهُونِ بِمَا كُنتُمۡ تَسۡتَكۡبِرُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّ وَبِمَا كُنتُمۡ تَفۡسُقُونَ

Transliteration: (Wa Yawma yu'radul lazeena kafaroo 'alan Naari azhabtum taiyibaatikum fee hayaatikumud dunyaa wastam ta'tum bihaa fal Yawma tujzawna 'azaabal hooni bimaa kuntum tastakbiroona fil ardi bighairil haqqi wa bimaa kuntum tafsuqoon (section 2))

और जिस दिन काफ़िर लोग आग के सामने पेश किए जाएंगे, (उनसे कहा जाएगा): "तुमने अपने हिस्से की पाकीज़ा चीज़ें अपनी दुनियावी ज़िंदगी में उड़ा दीं [56] और उनसे खूब फ़ायदा उठा लिया [57]; तो आज के दिन तुम्हें ज़िल्लत का अज़ाब [58] दिया जाएगा, इसलिए कि तुम ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर किया करते थे [59], और इसलिए कि तुम नाफ़रमानी [60] किया करते थे"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 20 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 20

"और जिस दिन काफ़िर लोग आग के सामने पेश किए जाएंगे, (उनसे कहा जाएगा): 'तुमने अपने हिस्से की पाकीज़ा चीज़ें अपनी दुनियावी ज़िंदगी में उड़ा दीं [56] और उनसे खूब फ़ायदा उठा लिया [57]; तो आज के दिन तुम्हें ज़िल्लत का अज़ाब [58] दिया जाएगा, इसलिए कि तुम ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर किया करते थे [59], और इसलिए कि तुम नाफ़रमानी [60] किया करते थे'।"

[56-57] दुनियावी ऐश-ओ-इशरत में ग़र्क़ होना

काफ़िरों ने अल्लाह की दी हुई नेअमतों, सेहत और फ़ुर्सत को सिर्फ़ दुनिया की लज़्ज़तों और नफ़्सानी ख़्वाहिशात में गँवा दिया और आख़िरत की ज़रा भी फ़िक्र न की। उन्होंने अपने आमाल का सारा सिला इसी दुनिया के खाने-पीने और ऐश में समेट लिया, इसलिए आख़िरत में उनके लिए सिवाए आग के कुछ न बचा।

[58] रुसवाकुन ज़िल्लत का अज़ाब

आज उन्हें दोज़ख़ में ऐसी सज़ा दी जाएगी जो सिर्फ़ जिस्मानी दर्द ही नहीं बल्कि इंतिहाई ज़िल्लत और रुसवाई भी साथ लाएगी।

[59-60] तकब्बुर और फ़िसक़ का अंजाम

यह दर्दनाक अंजाम उनके दो बड़े गुनाहों की सज़ा है: एक ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर करना (यानी अल्लाह और उसके रसूल के मुक़ाबले में घमंड दिखाना), और दूसरा अल्लाह की हदों को तोड़कर नाफ़रमानी (फ़िसक़) करना।

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