Transliteration: (Ulaaa'ikal lazeena haqqa 'alaihimul qawlu feee umamin qad khalat min qablihim minal jinni wal insi innahum kaanoo khaasireen)
"ये वे लोग हैं जिन पर (अज़ाब का) हुक्म साबित हो चुका [53], उन जिन्नों और इंसानों के गिरोह में जो उनसे पहले गुज़र चुके; बेशक वे ही नुक़सान उठाने वाले [54] थे।"
यह साबित करता है कि क़ियामत के दिन फै़सला ईमान की बुनियाद पर होगा, ख़ून के रिश्ते पर नहीं। मोमिन मोमिनों के साथ होंगे और काफ़िर काफ़िरों के साथ। अगर किसी नेक मोमिन का बेटा काफ़िर व नाफ़रमान मर जाए (जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का बेटा कनआन), तो माँ-बाप की नेकी उसे जहन्नम से नहीं बचा सकती।
जिन्नों और इंसानों के काफ़िरों की जमाअत में शामिल होकर हमेशा के अज़ाब में चले जाना ही सबसे बड़ा ख़सारा और हलाकत है।
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